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संपूर्ण धरती में जानवरों और पौधों के आवास विखंडन से प्रभावित हो रही है जैविक विविधता

जौनपुर

 13-10-2021 06:00 PM
निवास स्थान

हमारी धरती में जीवाणु, पौधों, जानवरों और कवक की 8 मिलियन से अधिक प्रजातियाँ मौजूद हैं। घास के मैदानों, जंगलों, गुफाओं और गहरे समुद्रों जैसे जीवों के अनुकूल वातावरण की विशाल विविधता के कारण इस तरह की व्यापक जैविक विविधता अस्तित्व में है।इनमें से लगभग अधिकांश पर्यावास एक दूसरे से काफी दूर आवास करते हैं, जैसे ऑस्ट्रेलिया (Australia) के कंगारुओं के हिमालय के हिम तेंदुओं से मिलने की संभावना नहीं है, और मीठे पानी की मछलियाँ अक्सर एक ही झील या तालाब तक ही सीमित रहती हैं। संचार या 'फैलाव' की ये बाधाएं पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता को आकार देने में एक प्रमुख भूमिका निभाती हैं।जैसे-जैसे हम मनुष्य की संख्या बढ़ रही है और हमारे द्वारा अपने परिवेश को संशोधित किया जा रहा है, हम नए अवरोध उत्पन्न करके जानवरों और पौधों के फैलाव आकृति को भी बदल रहे हैं। एक ऐसा भी समय हुआ करता था जब एशियाई हाथी परस्पर जुड़े जंगलों के माध्यम से पूरे भारत में स्वतंत्र रूप से घूमते रहते थे। आज ये मार्ग मानव बस्तियों और बुनियादी ढांचे द्वारा तेजी से अवरुद्ध कर दिए गए हैं। फैलाव में परिवर्तन पारिस्थितिक प्रक्रियाओं को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है और जैव विविधता प्रतिरूप को स्थायी रूप से बदल सकता है।
पर्यावास विखंडन को जैव विविधता के लिए एक तेजी से फैलने वाला खतरा माना जाता है, क्योंकि जैविक आक्रमण, अतिशोषण, या प्रदूषण की तुलना में इससे बड़ी संख्या में प्रजातियों के प्रभावित होने के आशय हैं।इसके अतिरिक्त, आवास विखंडन के प्रभाव प्रजातियों की क्षमता को नुकसान पहुंचाते हैं, जैसे कि देशी पौधे, अपने बदलते परिवेश में प्रभावी ढंग से अनुकूलन करने में सक्षम होते हैं।अंततःयह प्रजातियों की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जीन (Gene) प्रवाह को रोकता है, विशेष रूप से छोटे क्षेत्र में रहने वाली प्रजातियों के लिए। जबकि, बड़ी आबादी की प्रजातियों के लिए अधिक आनुवंशिक उत्परिवर्तन होते हैं और आनुवंशिक पुनर्संयोजन प्रभाव उस वातावरणों में प्रजातियों के अस्तित्व को बढ़ा सकते हैं। कुल मिलाकर, पर्यावास विखंडन के परिणामस्वरूप निवास स्थान का विघटन होता है और निवास स्थान का नुकसान होता है जो दोनों समग्र रूप से जैव विविधता को नष्ट करने में संबंधित होते हैं।
हालांकि प्राकृतिक प्रक्रियाओं जैसे ज्वालामुखी, आग और जलवायु परिवर्तन के माध्यम से निवास स्थान के विनाश के साक्ष्य जीवाश्म अभिलेख में पाए जाते हैं।उदाहरण के लिए, 300 मिलियन वर्ष पहले यूरामेरिका (Euro-America) में उष्णकटिबंधीय वर्षावनों के निवास स्थान के विखंडन से उभयचर विविधता का बहुत नुकसान हुआ, लेकिन साथ ही शुष्क जलवायु ने सरीसृपों के बीच विविधता के विस्फोट को बढ़ावा दिया।जबकि पर्यावास विखंडन अक्सर मनुष्यों के कारण होता है जब कृषि, ग्रामीण विकास, शहरीकरण और जलविद्युत जलाशयों के निर्माण जैसी मानवीय गतिविधियों के लिए देशी पौधों की कटाई कर दी जाती है। हालाँकि, जिस तरह से निवास स्थान विखंडन प्रजातियों की आनुवंशिकी को प्रभावित करता है और इस से प्रजातियों के विलुप्त होने की दर का भारी अध्ययन किया गया है, विखंडन को प्रजातियों के व्यवहार और संस्कृतियों को भी प्रभावित करने के लिए दिखाया गया है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि सामाजिक संपर्क एक प्रजाति के स्वस्थ्य और अस्तित्व को निर्धारित और प्रभावित कर सकते हैं।पर्यावास विखंडन उपलब्ध संसाधनों और आवासों की संरचना को बदल देता है, परिणामस्वरूप, प्रजातियों के व्यवहार और विभिन्न प्रजातियों के बीच की गतिशीलता को बदल देता है।प्रभावित व्यवहार एक प्रजाति के भीतर हो सकते हैं जैसे कि प्रजनन, संभोग, चारा, प्रजाति फैलाव, संचार और संचार प्रतिरूप या शिकारी-शिकार संबंधों जैसे प्रजातियों के बीच का आचरण हो सकता है।इसके अलावा, जब जानवर खंडित जंगलों या परिदृश्यों के बीच अज्ञात क्षेत्रों में उद्यम करते हैं, तो वे मनुष्यों के संपर्क में आ सकते हैं जो उन्हें एक बड़े जोखिम में डालता है और उनके बचने की संभावना को और कम कर देता है।
निवास स्थान जो कभी निरंतर थे, अलग-अलग टुकड़ों में विभाजित हो गए हैं। जैसा हम देख सकते हैं कि संपूर्ण भारत में, खनन, बांध, जलविद्युत परियोजनाओं, राजमार्गों, इंजीनियरिंग कॉलेजों, आश्रमों और अन्य उद्देश्यों के लिए संरक्षित क्षेत्रों में और उसके आसपास हर साल सैकड़ों परियोजनाओं को मंजूरी दी जा रही है।आधारिक संरचना ने वन क्षेत्रों की संख्या में 6% की वृद्धि की, और बड़े वन क्षेत्रों की संख्या में 71.5% की कमी की है। मध्य भारत में, वन क्षेत्र बड़े थे, लेकिन अधिक अलग-थलग थे, जबकि पश्चिमी घाट में छोटे वन क्षेत्र की संख्या अधिक थी।छोटे या अधिक अलग-थलग वन क्षेत्रों में,बड़े या कम अलग-थलग वन क्षेत्रों की तुलना में अधिक प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा अधिक बना रहता है।बड़ी संख्या में छोटे वन "द्वीप" आम तौर पर उसजैव विविधता के समान नहीं हो सकते हैं जो एक एकल वन विविधता समर्थन कर सकती है, भले ही उनका संयुक्त क्षेत्र एकल वन से कहीं अधिक क्यों न हो।
हालांकि, ग्रामीण परिदृश्य में वन द्वीप अपनी जैव विविधता में काफी वृद्धि करते हैं। साथ ही घनेपन के कारण लंबे जंगल के किनारे लोगों और वन्यजीवों के बीच संपर्क को बढ़ाते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष और रोग संचरण में वृद्धि होती है, और ये दोनों स्थिति मनुष्यों के लिए एक गंभीर खतरा उत्पन्न करती हैं।अधिकांश वनों (98%) में न्यूनतम वेध या फासला पाया गया, और भारत के अधिकांश वन क्षेत्र (77%) बड़े और अक्षुण्ण श्रेणी में आते हैं। ये परिणाम हमें बताते हैं कि हालांकि विखंडन बढ़ रहा है, लेकिन उचित प्रबंधन और शमन के साथ, भारत में वन क्षेत्रों के बीच संपर्क अभी भी बहाल किया जा सकता है।

संदर्भ :-

https://bit.ly/3mJIQHe
https://bit.ly/3v6VP9N
https://bit.ly/3AvSbrd

चित्र संदर्भ
1. मैक्वेरी पर्च (Macquarie perch) आवास विखंडन के कारण लुप्तप्राय है, जिसका का एक चित्रण (wikimedia)
2. प्रकृति में मनुष्य की दखल को संदर्भित करता एक चित्रण (cwf-fcf)
4. वन्यजीव क्रॉसिंग संरचनाएं हैं जो जानवरों को मानव निर्मित बाधाओं को सुरक्षित रूप से पार करने की अनुमति देती हैं, जिसका एक चित्रण (boons)



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