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भारी वजन ढोने वाले जानवरों की विशेषताएं तथा भारतीय सेना में उनका गौरवपूर्ण इतिहास

जौनपुर

 06-09-2021 11:29 AM
स्तनधारी

हमारे दैनिक जीवन में कई ऐसी घटनाएं होती हैं, जब हम देखते हैं की लोगों द्वारा किसी कमज़ोर बुद्धि वाले व्यक्ति को "गधा" कहकर संबोधित किया जाता है। प्रायः यह एक प्रकार का ताना होता है, जो उस व्यक्ति को गधे के सामान कमज़ोर बुद्धि वाला दर्शाता है। गधा एक ऐसा जानवर है, जो सदियों से इंसानों पर लादे जाने वाले अतिरिक्त बोझ को ढोता आ रहा है, आज इनकी कमज़ोर बुद्धि की निंदा करने के बजाय इंसानों को गधे और इस जैसे बोझ ढोने वाले जानवर के प्रति आभार व्यक्त करने की आवश्यकता है, जिसका कारण हम आगे समझेंगे।
वाहनों और हवाई सेवाओं (Drone) के विस्तार के साथ ही भविष्य की पीढ़ी को यह स्वीकार करने में थोड़ी मुश्किल हो सकती की, एक ऐसा भी समय था, जब इंसान एक स्थान से दूसरे स्थान पर आवाजाही करने और अपने बोझे को ढोने के लिए पूरी तरह से जानवरों पर निर्भर था। प्रायः ऐसे जानवर जिनकी पीठ पर सामान लादकर अथवा बैठकर एक स्थान से दूसरे स्थान में पहुंचा जा सकता है, अथवा जिन्हें मनुष्यों द्वारा परिवहन हेतु प्रयोग किया जाता है, वे पैक जानवर (pack animal) कहलाते हैं। यह बोझ को खींचकर ले जाने के विपरीत पीठ पर लादकर ले जाने में निपूर्ण होते हैं। ऊंट, याक, बारहसिंगा, जल भैंस, और लामाओं के साथ-साथ कुत्तों, घोड़ों, गधों और खच्चरों जैसे जानवर पारंपरिक पैक की श्रेणियों में आते हैं, जिनका उपयोग दुनियाभर में सदियों से आज भी किया जा रहा है।
यह भार खींचने वाले वाहनों अथवा जानवरों जैसे हल, गाड़ी, स्लेज या भारी लॉग से भिन्न होते हैं। उदाहरण के लिए बर्फीले क्षेत्रों में कुत्ते स्लेज का भार खींचते हैं, बल्कि ढोते नहीं हैं। वहीं हाथी का प्रयोग भार को खींचने के बजाय सदियों से जंगलों से लकड़ियों को ढोने के लिए किया जाता रहा है। हालांकि पैक एनिमल शब्द उन जानवरों को भी संदर्भित कर सकता है, जो प्राकृतिक रूप से जंगलों में रहते हैं और शिकार करते हैं, जैसे भेड़िये, हाइना, कुत्ते आदि। ऊंट, घरेलू याक, हिरन, बकरियां, पानी भैंस, घोड़े, गधे, खच्चरों को पारंपरिक पैक जानवरों की श्रेणी में गिना जाता है। घोड़े भार ढोने के अतिरिक्त परिवार के पालतू सदस्य के रूप में भी देखें जाते हैं। कभी-कभी, कुत्तों को छोटे भार ढोने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। भौगोलिक भिन्नता के साथ ही बोझ ढोने वाले जानवरों के चुनाव में भी अंतर देखा जा सकता है। जैसे:
1. आर्कटिक - बारहसिंगा और स्लेज कुत्ते
2. मध्य अफ्रीका और दक्षिणी अफ्रीका - बैल, खच्चर, गधे
3. यूरेशिया - गधे, बैल, घोड़े, खच्चर
4. मध्य एशिया - बैक्ट्रियन ऊंट, याक, घोड़े, खच्चर, गधे
5. दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया - जल भैंस, याक, एशियाई हाथी
6. उत्तरी अमेरिका - घोड़े, खच्चर, गधे, बकरियां
7. उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व - ड्रोमेडरी, घोड़े, गधे, खच्चर, बैल
सोलहवीं शताब्दी तक मध्य युग के दौरान भारी वजन ढोने के लिए घोड़ों और बैलों का इस्तेमाल किया जाता था। आज 21 वीं सदी में, पहुंचने तक बैलों, घोड़ों, खच्चरों, लामाओं, ऊंटों, कुत्तों और हाथियों को पैक जानवरों के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है। आज भी ये दुर्गम ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में भारी वजन को विस्थापित करने साथ ही पर्यटकों की सवारी करने और उनके सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंचाने में बहुपयोगी साबित होते हैं।
हालांकि इन जानवरों में अपने वजन से अधिक वजन उठाने की क्षमता होती हैं, किंतु इनकी भी एक तय सीमा होती हैं ।उदाहरण के तौर पर एक ऊंट की अधिकतम भार उठा सकने की क्षमता 300 किलोग्राम होती हैं। याक (Yaks) में भौगोलिक क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग वजनी भार उठाने की क्षमता होती हैं, जैसे सिचुआन (Sichuan) में, 165 पाउंड को 6 घंटे में 30 किमी तक ले जाया जाता है, तथा किंघई (Qinghai) में, 4100 मीटर की ऊंचाई पर, याक में 660 पाउंड का वजन नियमित रूप से लादा जाता है। लामा अपने शरीर के वजन का लगभग एक चौथाई भार वहन कर सकते हैं, इसलिए 440 पाउंड (200 किग्रा) का एक वयस्क नर लामा लगभग 110 पाउंड (50 किग्रा) वजन उठा सकता है। हिरन पहाड़ों में लंबे समय तक 40 किलो तक वजन उठा सकता है।
हालांकि सभी जानवरों द्वारा वजन ढोने की एक तय सीमा निर्धारित है, जिसका अंदाजा हम उसके वजन लेकर चलने से भी लगा सकते हैं। परंतु दुर्भाग्य से कई देशों में उनके शरीर में उनकी क्षमता से अधिक वजन लादा जाता है, जो उनके लिए असहनीय होता है। किंतु कई बार क्रूरता से मजबूरन उनसे क्षमता से अधिक वजन ढुलाया जाता है, जिस कारण उनकी मृत्यु भी हो जाती हैं।
भारतीय इतिहास में भार ढोने वाले जानवरों की कई गौरवपूर्ण गाथाएं दर्ज हैं। कुछ समय पूर्व भारतीय सेना ने लम्बे समय तक सेना में अपनी सेवा देने वाले पेडोंगी (Pedongi) नाम के खच्चर को सेना मेस (army mess) सम्मान देकर सम्मानित किया।
कारगिल युद्ध से ठीक पहले भारतीय सेना में खच्चरों सहित पशु परिवहन की सभी इकाइयों को खत्म करने का फैसला किया गया, किंतु कारगिल युद्ध के दौरान जब ख़राब मौसम की वजह से जंग में लड़ रही सेना को हेलीकॉप्टर में भी भोजन और रसद इत्यादि पहुंचना मुश्किल हो गया, उस समय खच्चरों ने आपूर्ति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। खच्चर उन पटरियों से भी गुजर सकते थे, जिन पर कोई वाहन नहीं पहुंच सकता था। आज भारतीय सेना में लगभग 6,000 खच्चरों का कार्यबल शामिल है, जो देश के पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों में भारतीय सीमाओं के साथ कठिन हिमालयी इलाकों में एक विश्वसनीय परिवहन साबित हो रहा है। ये खच्चर औसतन 18-20 साल तक सेना में अपनी सेवा देते हैं, हलाकि पेडोंगी 1962 में भारतीय सेना में शामिल हुए थे, और 25 मार्च, 1998 को अपनी मृत्यु तक सेवा की। उन्होंने सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले सैन्य खच्चर के रूप में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी जगह बनाई।

संदर्भ
https://bit.ly/2WIYvxN
https://bit.ly/3zI1LHQ
https://bit.ly/3ta30gB
https://bit.ly/3DF8pBb
https://bit.ly/2VaXbCP
https://en.wikipedia.org/wiki/Pack_animal

चित्र संदर्भ
1. भार ढोकर हँसते हुए खच्चर का एक चित्रण (flickr)
2. ऊंट एक पैक जानवर का एक चित्रण (flickr)
3. पैक जानवर के रूप में याक एक चित्रण (stock.adobe)
4. लम्बे समय तक सेना में अपनी सेवा देने वाले पेडोंगी (Pedongi) नाम के खच्चर का एक चित्रण (twitter)



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