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भारत में आलू की अनुबंध खेती का महत्व

जौनपुर

 10-08-2021 08:36 AM
भूमि प्रकार (खेतिहर व बंजर)

आलू की उत्पत्ति पेरू (Peru) और बोलीविया (Bolivia) के बीच की सीमा में हुई थी‚ और यह एंडीज (Andes) और दक्षिणी चिली (Southern Chile) में मुख्य भोजन बन गया था। 16 वीं शताब्दी के अंत तक‚ कई यूरोपीय देशों (European countries) में आलू प्रस्तावित किए गए और वहां से 17 वीं शताब्दी की शुरुआत में ये भारत पहुंचे।
आलू की खेती उत्तरी भारत के औपनिवेशिक घर के बगीचों में‚ विशेष रूप से शिमला और नीलगिरि पहाड़ियों में की जाती थी। हालाँकि‚ 1941 तक‚ आलू का उत्पादन भारत में समृद्ध विकास तक नहीं पहुँच पाया था। आलू के किसान‚ पेप्सिको (PepsiCo) के उत्पादन प्रयासों और भारत के राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण हैं। 1990 के दशक के अंत में‚ वैश्वीकरण ने भारत में आलू के उत्पादन और विपणन में महत्वपूर्ण बदलाव लाए‚ जिससे चीन (China) के बाद‚ भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक बन गया। अनुबंध खेती (contract farming)‚ किसानों और कंपनी (company) के बीच‚ एक निश्चित प्रकार के कृषि उत्पादों या वस्तुओं के उत्पादन और आपूर्ति के लिए‚ एक निश्चित मात्रा में पूर्व-सहमत मूल्य और समय पर नियमित रूप से अग्रिम समझौतों के तहत एक समझौता है।
पंजाब के कई जिलों में टमाटर के लिए‚ अनुबंध खेती की सफलता से प्रेरित होकर पेप्सिको (PepsiCo)‚ खाद्यान्न के नमूनों का दृढ़ता से अनुकरण कर रहा है‚ जैसे बासमती चावल‚ मिर्च जैसे मसाले‚ तिलहन जैसे मूंगफली और आलू जैसी सब्जी फसलों के मामले में। पेप्सिको ने 2007 में अपने अनुबंध कृषि कार्यक्रम के हिस्से के रूप में‚ सूचकांक आधारित बीमा उत्पाद पेश किया‚ जिसका उद्देश्य किसानों और इसकी आपूर्ति श्रृंखला में फसल के मौसम संबंधी जोखिम को सीमित करना था। भारत के सबसे अधिक आलू उत्पादक क्षेत्रों में से एक जौनपुर सहित उत्तरी मैदानी इलाकों में‚ आलू उगाने वाले क्षेत्रों में अनुबंध खेती लंबे समय से प्रचलित है। भारत में आलू की खेती का एकड़ दिन-ब-दिन बढ़ रहा है। पेप्सिको और अनुबंध खेती जैसे वैश्विक खाद्य खिलाड़ियों की भागीदारी के कारण अधिक से अधिक किसान अब प्रक्रिया ग्रेड किस्मों (process grade varieties) को विकसित कर रहे हैं।
हाल ही में पेप्सिको और गुजरात के अल्पसंख्यक आलू के किसानों के बीच हुए विवाद के बाद अनुबंध खेती को लेकर बहस फिर से शुरू हो गई है। सिर्फ इसलिए क्योंकि ये छोटे किसान आलू की उन किस्मों को उगा और बेच रहे थे‚ जो उनके लोकप्रिय चिप्स ‘लेज़’ (Lays) के उत्पादन के लिए पेप्सीको द्वारा आरक्षित और पेटेंट (patented) कराए गए थे‚ कंपनी (company) द्वारा प्रत्येक पर एक करोड़ रुपये से अधिक का भारी जुर्माना लगाया जा रहा था। कार्यकर्ताओं के रोष और किसानों के अधिकारों पर भारत के कानूनों को लागू करने के बाद‚ पौधों की विविधता और किसानों के अधिकार (पीपीवीएफआर) (Protection of Plant Variety and Farmers Right (PPVFR)) का संरक्षण‚ पेप्सिको ने अपने जुझारू कदम को वापस ले लिया और किसानों को अनुबंध खेती के दायरे में ले जाने की पेशकश की और उन्हें पेप्सिको को ही विशेष किस्म के एफसी5 (FC5) के आलू का उत्पादन और बिक्री करने की अनुमति दी। अनुबंध खेती में किसानों के लिए स्पष्ट लाभ हैं क्योंकि यह उन्हें आलू या किसी अन्य उपज के लिए समस्या मुक्त उत्पादन प्रक्रिया प्रदान करता है। जिसमे उन्हें मंडियों (mandis) के माध्यम से फसल की बिक्री के बारे में परेशान नहीं होना पड़ता और फसल की विफलता के लिए बीमा का प्रावधान भी है। यह उन्हें आय का एक सुरक्षित और स्थिर स्रोत देता है। अनुबंध खेती के तहत‚ किसानों के कई मामलों के अध्ययन ने‚ किसानों को बड़े निगमों के साथ इस तरह के अनुबंधों से संतुष्ट होने की ओर इशारा किया है‚ क्योंकि इससे अपेक्षाकृत जोखिम मुक्त खेती होती है।
भारत के आलू उत्पादक क्षेत्रों में से एक‚ विशेष रूप से पश्चिम बंगाल (West Bengal) में‚ आलू उगाने वाले क्षेत्रों में‚ अनुबंध खेती लंबे समय से प्रचलित है। पेप्सिको (PepsiCo)‚ 24‚000 किसानों के साथ काम कर रही है और किसानों को बीज‚ रासायनिक उर्वरक और बीमा सुविधा प्रदान करती है जिसके बदले में वे पूर्व निर्धारित कीमतों पर‚ किसानों से फसल वापस खरीद लेते हैं। यह किसानों और खरीदारों के बीच एक लंबवत सामंजस्य है। इस सफलता की कहानी और कई अन्य लोगों ने समान रूप से भारत में सभी प्रकार की उपज के लिए‚ अनुबंध खेती की अधिवक्ता के लिए नीति आयोग (Niti Ayog) का नेतृत्व किया है। एक साल पहले नीति आयोग ने मॉडल कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कोड (Model Contract Farming Code) की घोषणा की थी।
सामान्य अनुबंध कृषि समझौते पर हस्ताक्षर करने से‚ उत्पादकों के पास अपने उत्पादन के लिए एक सुनिश्चित बाजार होता है‚ लेकिन अनुबंध में शक्ति असंतुलन दर्शाता है कि दूसरी ओर‚ असमान संविदात्मक शर्तें उन्हें कंपनी की तरह पर्याप्त सुरक्षा प्रदान नहीं करती हैं। उत्पादकों को अपने उत्पादन का 100 प्रतिशत कंपनी को बेचना पड़ता है और यदि वे किसी अन्य दल के साथ एक समझौता करना चाहते हैं‚ तो वे कंपनी द्वारा पूर्व सहमति प्राप्त करने के लिए बाध्य हैं। कंपनी को उत्पादन स्थल का दौरा करने और सभी कृषि गतिविधियों की निगरानी करने का अधिकार है‚ जिसका अर्थ है कि उत्पादकों को उत्पादन पर व्यापक नियंत्रण के लिए सहमत होना पड़ता है। कंपनी द्वारा आवश्यक किस्म की रोपण सामग्री ही प्रदान की जाती है‚ लेकिन किसान द्वारा भुगतान करने के बाद ही।
विकासशील देशों में कोविड-19 के आर्थिक प्रभाव पर‚ आईजीसी (IGC) की नज़र भारत पर केंद्रित रही‚ जहाँ महामारी छोटे किसानों की बढ़ती मर्मज्ञता और सुधार की आवश्यकता वाले कृषि बाजारों की बुरी स्थिति को प्रकट कर रही थी। भारत का लगभग 90% कृषि क्षेत्र‚ छोटे और सीमांत किसानों से बना है। ये किसान विशेष रूप से आर्थिक दहशत की चपेट में हैं‚ जिनमें कोविड-19 लॉकडाउन के शिकार हुए किसान शामिल हैं। अगस्त 2020 में‚ आईजीसी (IGC) ने एशियाई विकास अनुसंधान संस्थान (एडीआरआई) (Asian Development Research Institute (ADRI)) के साथ मिलकर भारत के कृषि बाजारों पर कोविड-19 के तीन प्रमुख प्रभावों पर चर्चा करने के लिए एक पैनल (panel) का गठन किया –
(1) मुख्य उपज बनाम खराब होने वाले खाद्य पदार्थों पर विभेदक प्रभाव - भारत के मार्च 2020 के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन पर विचार करते हुए‚ जे वी मीनाक्षी ने हरियाणा ‚ मध्य प्रदेश‚ पंजाब‚ राजस्थान और उत्तर प्रदेश में मुख्य खाद्य फसलों और खराब होने वाली उपज पर‚ अंतर प्रभाव पर केंद्रित अपना शोध प्रस्तुत किया। इस शोध मूल्यांकन के परिणाम बताते हैं कि बाजार सुधारों को अपनाना‚ मुख्य खाद्य फसलों की तुलना में जल्द खराब होने वाले उत्पादों के लिए बहुत अधिक मायने रखता है। राज्यों ने कहा कि सूचीबद्ध फल और सब्जियां‚ कीमतों में 10 प्रतिशत से अधिक की कमी को रोकने में सक्षम थीं। और यह देखा गया है कि जहां बाजार को नियंत्रणमुक्त किया गया था‚ वहां खराब होने वाली वस्तुओं की बिक्री अपेक्षाकृत अधिक हुई।
(2) श्रम आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करना - श्रवण कुमार ने इस विचार की अनुकृति करी कि‚ कोविड-19 से संबंधित लॉकडाउन ने कृषि आदान-प्रदान तथा रबी फसलों की कटाई को बाधित करके छोटे और सीमांत किसानों की भेघता को बढ़ा दिया‚ जिनकी खेती और कटाई सूखे महीनों में की जाती है। कुमार के अनुसार‚ बिहार में किसानों ने अपनी गति को प्रतिबंधित पाया और फसल मशीनरी (harvest machinery) के लिए‚ कृषि श्रमिकों और ऑपरेटरों (operators) सहित मजदूरों की कमी का सामना करना पड़ा। जब सरकार ने कृषि श्रमिकों की गति पर प्रतिबंध हटा दिया‚ तो बिहार में फसल का समर्थन करने के लिए पंजाब‚ हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से 650 ड्राइवरों (drivers) को जुटाना पड़ा।
(3) अप्रभावी सामाजिक सुरक्षा जाल के चल रहे परिणाम - उपलब्ध आंकड़ों का उपयोग करते हुए कृषि पर कोविड-19 और लॉकडाउन के प्रभाव पर चर्चा करते हुए‚ महेंद्र देव ने कहा कि छोटी-मोटी खेती वाले किसान समरुप नहीं हैं। बल्कि वे खेत और घरेलू विशेषताओं के एक विविध समूह का दावा करते हैं और उनकी जीविका‚ उनके सामने आने वाली बाधाओं के अनुसार भिन्न हो सकती हैं। देव ने बताया कि‚ बड़े किसानों की तुलना में छोटे किसानों की आय बहुत कम है‚ यह बड़े किसानों का लगभग दसवां हिस्सा है। जैसे-जैसे कोविड-19 की स्थिति बिगड़ती गई‚ किसानों को सूक्ष्म वित्तीय संस्थानों के तालाबंदी और बंद होने के कारण नकदी की कमी का सामना भी करना पड़ा।

संदर्भ:
https://bit.ly/37qjmHH
https://bit.ly/3s0ojjR
https://bit.ly/3fFXMU4
https://bit.ly/2XhRMqR
https://bit.ly/3lCqdWZ

चित्र संदर्भ
1. खोदने के पश्चात् खेतों में पड़े आलूओं का एक चित्र (flickr)
2. खेतों से शेष बचे आलू के दानों को बीनती महिला का एक चित्रण (flickr)
3. आलू से निर्मित विभिन्न उद्पादों का एक चित्रण (flickr)
4. आलू की गूलों में गुड़ाई करते कृषकों का एक चित्रण (flickr)



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