दुनिया भर में साम्प्रदायिक एकता की मिसाल पेश करते हैं गुरूद्वारे

जौनपुर

 22-07-2021 10:44 AM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

अनेकता में एकता हमारे देश भारत की सबसे बड़ी विशेषता है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि, जिस बाग में तरह-तरह के फूल हों, उसकी खूबसूरती अद्भुत होती है, और उनके इस कथन को भारत के विभन्न धर्म एक ठोस आधार देते हैं, जहाँ समय समय पर हमें धार्मिक एकता के उदाहरण देखने को मिलते रहते हैं। साथ ही भारत से ही विश्व भर में प्रसारित सिख समुदाय के लोग, दुनिया भर में अपने सराहनीय कार्यों से विश्व स्तर पर अपनी आदर्श छवि बनाने में सफल हुए हैं। विश्व भर में सिखों की लिकप्रियता और विस्तार की कल्पना हम इसी बात से लगा सकते हैं की, अकेले ब्रिटेन में करीब 200 गुरुद्वारे हैं। पंजाबी शब्द गुरुद्वारे का शाब्दिक अर्थ "गुरु का निवास होता है" या "वह दरवाजा जो आपका गुरु की ओर मार्गदर्शन करता है"। यहां गुरु कोई व्यक्ति न होकर सिख धर्मग्रंथो की पवित्र पुस्तक "गुरु ग्रंथ साहिब "होती है। कोई भी इमारत जहां गुरु ग्रंथ साहिब की उपस्थिति होती है, वह गुरुद्वारा कहलाती है। यह मूल रूप से ऐसा पावन स्थान होता है, जहां सिख समुदाय के लोग सामूहिक पूजा हेतु एकत्र होते हैं। विश्व का सबसे पहला गुरुद्वारा गुरु नानक के द्वारा करतारपुर में 1521-2 के दौरान बनाया गया था।
गुरूद्वारे को गुरु के निवास (ईश्वर के आवास स्थल) के रूप में मानने के बावजूद सिख समुदाय ईश्वर के सर्वव्याप्त (ईश्वर हर जगह मौजूद है) होने पर विश्वास रखते हैं। हालाँकि सिखों के गुरु अर्जुन देव से पूर्व सिख धार्मिक गतिविधियों की स्थली को "धर्मशाला" से संबोधित किया जाता था, जिसका मतलब "आस्था का स्थान" होता है। गुरुद्वारा सिख समुदाय के अलावा दूसरे धर्मों के लिए भी बेहद जरूरी और पावन स्थान साबित होता है, क्यों की गुरुद्वारों का प्रयोग दूसरे कल्याणकारी उद्द्येश्यों की पूर्ती हेतु भी किया जाता है, जैसे:-
1. इस स्थान में धार्मिक समारोह आयोजित किये जाते हैं।
2. यहां आध्यात्मिक ज्ञान सीखा जा सकता है ।
3. इस स्थान पर नन्हे बच्चे सिख धर्म, नैतिकता, रीति-रिवाज, परंपराएं और ग्रंथ सीखते हैं।
4. इस स्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह भी होती है, की यहां पर जरूरतमंद लोगों को भोजन, आश्रय और अन्य ज़रूरी सहयोग भी प्रदान किए जाते हैं, जिनकी उन्हें आवश्यकता होती है। और इस स्थान का प्रबंधन इस समुदाय की एक समिति द्वारा किया जाता है।
मूल रूप से गुरुद्वारे के भीतर पूजा हेतु कोई मूर्ति या धार्मिक चित्र नहीं होता, और न ही मोमबत्तियां, धूप, या घंटियां, या कोई अन्य कर्मकांड इसके भीतर होता है। क्योंकि वे भगवान को किसी भौतिक स्वरूप को न मानकर , उसके सर्वव्याप्त होने पर विश्वास रखते हैं। गुरूद्वारे के भीतर केवल पवित्र ग्रंथ को तख्त या मंजी साहिब, जिसका अर्थ है "सिंहासन" पर रखा जाता है। और जब यह पढ़ने के प्रयोग में नहीं होती, तो यह एक सुंदर कपडे से ढकी रहती है। इस ग्रंथ के ऊपर एक व्यक्ति (जिसे चौर कहा जाता है) वह एक पंखा गुरु ग्रंथ साहिब के ऊपर लहराता रहता है।
हालाँकि सिख गुरु ग्रंथ साहिब के प्रति श्रद्धा दिखाते हैं, लेकिन उनकी श्रद्धा इसकी आध्यात्मिक सामग्री (शबद) के प्रति है, न कि पुस्तक के प्रति। पुस्तक शब्द की दृश्य अभिव्यक्ति मात्र है। एक गुरुद्वारे में चार दरवाजे होते हैं, जिन्हें शांति का द्वार, आजीविका का द्वार, शिक्षा का द्वार और अनुग्रह का द्वार कहा जाता है। ये दरवाजे इस बात का संकेत होते हैं, कि यहां सभी जातियों का समस्त दिशाओं से सहर्ष स्वागत है। साथ ही यह दर्शाने के लिए कि गुरु का प्रकाश हमेशा दिखाई देता है, और किसी भी समय सभी के लिए सुलभ है, गुरूद्वारे में हमेशा एक रौशनी जली रहती है। गुरद्वारों में समय-समय पर सभी को मुफ्त भोजन (लंगर) की व्यवस्था की जाती है, यहाँ परोसे जाने वाले प्रदायिक भोजन के लिए लंगर शब्द का प्रयोग किया जाता है। यह भोजन सादा और शाकाहारी होता है, ताकि धनवान लोगों द्वारा यह अपनी श्रेष्ठता दिखाने का माध्यम न बने, और गुरुद्वारे का कोई भी आगंतुक, (जो भी उनकी आस्था के आहार प्रतिबंध हैं) लंगर में खा सके। इन गुरुद्वारों में निरंतर प्रार्थनाओं का दौर भी चला रहता है, विशेष रूप सिखों के प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव जी द्वारा उच्चारित आरती गन मै थाल, रव चंद दीपक बने...। आमतौर पर यह अमृतसर स्थित सिखों के तीर्थ स्थल श्री हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) में प्रतिदिन संध्या समय रहरास साहिब के पाठ व अरदास के साथ की जाती है। यह आरती मूल रूप मे गुरमुखी मे लिखी हुई है, और सिखों के पवित्र आदि ग्रन्थ में शामिल है। सिख समुदाय अपनी दया भावना, उदार हृदय और खुली विचारधारा के संदर्भ में विश्व के हर कोने में सम्मान पाता है।
पंजाब में सांप्रदायिक सद्भाव की एक और मिसाल कायम करते हुए जमलेरकोटला (Jamlerkotla) के मुस्लिम बहुल शहर गुरुद्वारा 'साहिब हा दा नारा' (रजि.) में एक साथ नमाज और गुरबानी का पाठ किया गया। गुरुद्वारा साहिब के प्रमुख ग्रंथी नरिंदरपाल सिंह ने कहा इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य यह पुष्टि करना था, कि हम सभी एकजुट हैं, मुस्लिम समुदाय के सदस्यों ने कहा कि ऐतिहासिक गुरुद्वारे में जाना उनके लिए कोई नई बात नहीं है, क्योंकि वे अपने जन्म से ही इस गुरुद्वारे में आते रहे हैं। वही दूसरी और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में, एक मुस्लिम व्यक्ति को मलेशिया के एक गुरुद्वारे में नमाज अदा करते हुए देखा गया, जबकि एक गुरुद्वारे में गुरबानी का पाठ किया जा रहा था।

संदर्भ
https://bit.ly/3zitTkb
https://bit.ly/3BtsMQK
https://bit.ly/3wTu3gq
https://bbc.in/3hRJrW1
https://bit.ly/3roMGYa
https://bit.ly/3hTlMVr
https://bit.ly/3rn7BuX

चित्र संदर्भ
1. गुरुद्वारे में नमाज़ अदा करते मुस्लिम युवकों का एक चित्रण (facebook)
2. गुरूद्वारे के भीतर का एक चित्रण (wikimedia)
3. गुरद्वारे में नमाज़ी का एक चित्रण (facebook)



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