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लेनिन की नई आर्थिक नीति-1921 ने भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित किया

जौनपुर

 19-03-2021 10:06 AM
उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक
आर्थिक नीति (Economic policy) से आशय उन सरकारी नीतियों से होता है जिनके द्वारा किसी देश के आर्थिक क्रियाकलापों का नियमन किया जा सके। आर्थिक नीति के अन्तर्गत करों के स्तर निर्धारित करना, सरकार का बजट, मुद्रा की आपूर्ति, ब्याज दर के साथ-साथ श्रम-बाजार, राष्ट्रीय स्वामित्व, तथा अर्थव्यवस्था में सरकार के हस्तक्षेप के अनेकानेक क्षेत्र आते हैं। आर्थिक नीति एक व्यापक नीति है और इसमें अनेक नीतियों का समावेश किया जाता है, जैसे - कृषि नीति, औद्योगिक नीति, वाणिज्य नीति, राजकोषीय नीति, मौद्रिक नीति, नियोजन नीति, आय नीति, रोजगार नीति, परिवहन नीति एवं जनसंख्या नीति आदि। आर्थिक नीति केवल वस्तुओं का क्रय विक्रय का मूल्य ही नहीं है, आर्थिक नीति किसी देश की सरकार की वर्तमान विचारधारा को दर्शाती है और यह एक मजबूत राष्ट्र के निर्माण के लिए आवश्य भी है। भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान संचरना कोई आज की नहीं है, इसके मूल सूत्र तो इतिहास में बहुत गहरे है। विशेष रूप से उस अवधि में जब भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व दो सौ साल तक ब्रिटिश शासन के अधीन था। स्वतंत्रता प्राप्ति तक, 200 वर्षों के विदेशी शासन का प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रत्येक आयाम पर अपनी पकड़ बना चुका था। कृषि क्षेत्र पहले से ही अत्यधिक श्रम-अधिशेष की मार झेल रहा था। उसकी उत्पादकता का स्तर भी बहुत कम था। औद्योगिक क्षेत्र भी आधुनिकीकरण वैविध्य, क्षमता संवर्धन और सार्वजनिक निवेश में वृद्धि की माँग कर रहा था। व्यापक गरीबी और बेरोजगारी भी सार्वजनिक आर्थिक नीतियों को जनकल्याणोन्मुखी बनाने का आग्रह कर रही थीं। संक्षेप में, देश में सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ बहुत अधिक थीं। ऐसे में भारत ने लेनिन (Lenin) द्वारा प्रस्तावित 1921 की नई आर्थिक नीति (New Economic Policy (NEP)) को अपनाया।
ऐतिहासिक रूप से, रूस सदियों से भारतीयों के लिए वैचारिक प्रेरणा का प्रमुख स्रोत रहा है, जिसकी शुरुआत बोल्शेविक क्रांति (Bolshevik Revolution) से हुई थी। रूसी घटनाओं और नीतियों के विभिन्न उदाहरण हैं जिन्होंने भारत को प्रभावित किया हैं, और 1921 की नई आर्थिक नीति उनमें से एक है। एनईपी को लेनिन द्वारा असफल अर्थव्यवस्था के प्रभावों को बदलने के लिए प्रस्तावित किया गया था। एनईपी ने अपनी संपूर्णता में एक साम्यवादी अर्थव्यवस्था होने के बजाय, रूसी समाज में पूंजीवाद के कुछ पहलुओं को प्रभावित करने की कोशिश की, जिसे लेनिन ने 'राज्य पूंजीवाद' कहा था। राज्य पूंजीवाद ने एक पूंजीवादी उन्मुख आर्थिक नीति को अपनाने का उल्लिखित किया जिसने मिश्रित अर्थव्यवस्था की शुरुआत की। 1920-21 में हुए विद्रोह के बाद लेनिन ने साम्यवादी व्यवस्था में परिवर्तन करने और पूंजीवादी व्यवस्था की ओर लौटने के उद्देश्य से “नई आर्थिक नीति” की घोषणा की। लेनिन ने यह अनुभव किया कि साम्यवाद को बचाने के लिये थोड़ा सा पूंजीवाद अपनाना पड़ेगा। नई आर्थिक नीति का उद्देश्य श्रमिक वर्ग और कृषकों की आर्थिक स्थिति को मज़बूत बनाना, पूरे देश की कामगार आबादी को देश की अर्थव्यवस्था के विकास में सहयोग करने के लिये प्रोत्साहित करना व अर्थव्यवस्था के मूल उपकरणों को नियंत्रित रखते हुए आंशिक रूप से पूंजीवादी व्यवस्था को कार्य करने की अनुमति देना था। लेनिन की नयी आर्थिक नीति उसकी दूरदर्शिता का परिणाम थी जिसने रूस की स्थिर अर्थव्यवस्था को प्रगति के पथ पर अग्रसर कर दिया। लेनिन की इस नई आर्थिक नीति का दूरगामी परिणाम यह हुआ कि रूस पुनर्निर्माण संभव हो सका। 1921 में आर्थिक उत्पादन दर स्थिर रही लेकिन इसने 1922 में और इसके बाद उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। इससे न केवल किसानों और कृषि का कल्याण हुआ, बल्कि औद्योगिक उत्पादन में भी वृद्धि हुई। यह नीति किसानों और छोटे पैमाने के मजदूरों को उच्च लाभ के लिए अपने उत्पादों को निजी व्यक्ति को बेचने का अवसर प्रदान करती है। इस अवधि में सूती वस्त्रों, खनिज तेल, कोयला, इस्पात, लोहा , चीनी आदि के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इस प्रकार लेनिन ने एक मिली-जुली परिवर्तनशील व्यवस्था और राजकीय पूंजीवाद के माध्यम से रूस की क्षतिग्रस्त अर्थव्यवस्था को सुधारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत आजादी के बाद अत्यधिक गरीबी, अत्यधिक निरक्षरता, और बर्बाद आर्थिक स्थिति से जूझ रहा था। भारत को अपनी अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन के लिए सभी क्षेत्रों को कवर करने के लिए एक रणनीति की आवश्यकता थी। दुनिया भर के अन्य विकसित औद्योगिक देशों के साथ तुलना करने पर भारत ने अपना औद्योगिकीकरण का सफर शुरू ही किया था। नेहरू जी लेनिन की नीतियों से काफी प्रभावित थे। उन्होंने एक मिश्रित अर्थव्यवस्था स्थापित करने की कोशिश की जिसमें समाजवाद और पूंजीवाद दोनों तत्व थे। स्वतंत्रता के बाद की भारतीय अर्थव्यवस्था की एक अनूठी विशेषता यही थी कि यह एक मिश्रित अर्थव्यवस्था थी जोकि लेनिन द्वारा प्रस्तावित 1921 की नई आर्थिक नीति से प्रभावित थी। भारत में इस नीति ने विकसित शहरी क्षेत्रों और दर्दनाक रूप से पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों के बीच संपर्क स्थापित करने पर जोर दिया गया। साथ ही भारत ने लेनिन की आर्थिक नीति को बदलकर, इसे लोकतांत्रिक सरकार के लिए उपयुक्त बनाने के लिए स्वीकार किया। सार्वजनिक क्षेत्र की संस्था को नई नीति के परिणामस्वरूप स्थापित किया गया था, जबकि भारतीय व्यक्तिगत व्यापारियों और व्यवसायियों के छोटे समूह को संगठित करने के लिए मौद्रिक समर्थन मुश्किल था। भारत की पंचवर्षीय योजना नई आर्थिक नीति के तहत लेनिन द्वारा बड़े उद्योगों के सख्त नियंत्रण के आदर्शों पर आधारित थी। नेहरू ने लेनिन सुधारों की तर्ज पर राज्य के वित्त और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को नियंत्रित करने का भी प्रयास किया। दूसरी ओर, उन्होंने कृषि क्षेत्र और लघु उद्योगों पर अधिक जोर दिया और इन क्षेत्रों को एक समान पैटर्न पर निजी निवेश के लिए खोल दिया। भारत में भूमि सुधार का प्रयास यूएसएसआर (USSR) में भूमि के वितरण से प्रभावित हुआ। इस प्रकार भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने 1930 के दशक में एक समाजवादी बढ़त हासिल की थी और देश की अर्थव्यवस्था सुधारने की ओर अपने कदम बढ़ाये।
एक विकसित देश के लिए अपनी स्थिति को बनाये रखने के लिए विभिन्न व्यवसायों के बीच संतुलन बनाए रखना बहुत महत्वपूर्ण है, और इस व्यावसायिक संतुलन बनाए रखने के लिए उनमें तेजी से विकास करना एक बुनियादी आवश्यकता है। इस नीति में कृषि क्षेत्र और लघु उद्योगों पर अधिक जोर दिया गया और इन क्षेत्रों को निजी निवेश के लिए खोल दिया गया। जौनपुर की अर्थव्यवस्था भी काफी हद तक कृषि और लघु उद्योगों पर आधारित है। लघु व्यवसाय यह उपजीविका का साधन है। जौनपुर जिले में बढ़ई, लुहार, कुम्हार, सुनार, जुलाहा, नाई यह व्यवसाय वंशानुगत पेशे के मुताबिक किये जाते आ रहे हैं। इनके अलावा खेती, खेती से जुड़े कामकाज़, गृहउद्योग, मिल-कारखानों पर काम, निर्माण एवं कामों पर मजूरी करना तथा शिक्षित युवक-युवती कार्यालय, शिक्षण क्षेत्र आदि में नौकरी कर रहे हैं। लकड़ी के खिलौने, चीनी उद्योग, खाद का कारखाना, चमड़े, लोहे, इत्रतेल, बीड़ी, एल्युमीनियम के बर्तन, कालीन, छपाई, सुरती, जर्दा, तेल, मोमबत्ती आदि पेशे जौनपुर में व्यवसाय सालों से चलते आ रहे हैं। यहां पर आबादी का मुख्य व्यवसाय कृषि है। इसलिए तुलनात्मक रूप से किसानों और खेतिहर मजदूरों की संख्या अन्य व्यवसायों की तुलना में अधिक है। जौनपुर जिले में औसतन 6% लोग औद्योगिक पेशे में हैं, औसतन 66% खेती और उससे जुड़े काम, औसतन 28% बाकी पेशों के अंतर्गत काम करते हैं। सन 2002 में जौनपुर जिले में पंजीकृत कारखाने 476 थे तथा कृषि मजदूरों की संख्या 112827 थी। जौनपुर एक कृषि क्षेत्र है। जिले की अधिकांश कामकाजी आबादी कृषि या कृषि गतिविधियों से जुड़ी हुई है। धान, गेहूं, सरसों, और दालें मुख्य रूप से यहां उगाये जाने वाली फसल हैं। ज्वार, बाजरा, मक्का और आलू सीमित क्षेत्र में बोए जाते हैं। जिले में अनाज की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 546.21 ग्राम प्रति दिन है।
संदर्भ:
https://bit.ly/3vbxbog
https://bit.ly/30uiMFs
https://bit.ly/3eoLJL0
https://bit.ly/3vjztBR
https://bit.ly/38tqoMV
http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/166940/7/07_chapter%202.pdf
https://prarang.in/jaunpur/posts/916/postname

चित्र संदर्भ:
मुख्य तस्वीर में जौनपुर और रूसी क्रांति को दिखाया गया है। (प्रारंग)
दूसरी तस्वीर में लेनिन को दिखाया गया है। (विकिपीडिया)
तीसरी तस्वीर में बोल्शेविक क्रांति को दिखाया गया है। (फ़्लिकर)


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