भारत में कलात्मक अभिव्यक्ति के साधन प्रिंटमेकिंग का इतिहास

जौनपुर

 03-09-2020 09:26 AM
द्रिश्य 3 कला व सौन्दर्य

जीवन ऊर्जा का महासागर है और जब इसमें चेतना जागृत होती है, तो ऊर्जा जीवन को कला के रुप में उभारती है, और कला के माध्यम से ही व्यक्ति द्वारा मानवीय भावों की अभिव्यक्ति की जाती है। ऐसे ही प्रिंटमेकिंग (Printmaking) एक ऐसी ही कलात्मक अभिव्यक्ति है, जिसकी जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी हुई हैं। कला के रूप में इसका ऐतिहासिक विकास काफी दिलचस्प है। कलात्मक अभिव्यक्ति का यह माध्यम मुख्य रूप से जन संचार या प्रलेखन के साधन के रूप में उपयोग किया जाता था। हालांकि, यह सबूत पाये गये हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता के समय तक भारत में बड़े पैमाने पर दोहराव की अवधारणा का उपयोग किया गया था। उदाहरण के लिए जमीन के अनुदान, तांबे की प्लेटों पर जानकारी उत्कीर्ण करके और लकड़ी, हड्डी, हाथी दांत जैसी विभिन्न सतहों पर नक्काशी करके मूल रूप से दर्ज कर उस समय के एक महत्वपूर्ण शिल्प के रूप में प्रलेखित किए गए थे। समकालीन प्रिंटमेकिंग गुटेनबर्ग (Gutenberg) की बाइबल (Bible) को छापने के लगभग सौ साल बाद 1556 में भारत आयी। इस समय, प्रिंटमेकिंग का उपयोग केवल नकल करने और सामग्री को पुन: पेश करने के लिए एक उपकरण के रूप में किया गया था।

साथ ही वुडब्लॉक (Woodblock) चित्रण का मुख्य रूप से उपयोग बाइबल प्रिंटिंग (Bible printing), पोस्टर (Posters), प्लेइंग कार्ड (Playing cards), मैनिफ़ेस्टो (Manifestos) और बुक कवर (Book covers) में किया जाता था। यह छवियों या पाठ को पुन: प्रस्तुत करने जैसा था। पिछले 90 वर्षों में, प्रिंटमेकिंग दृश्य कला के एक माध्यम के रूप में विकसित हुई। वर्तमान समय में भी कई लोग इसमें रूचि रखते हैं, कला के इस रूप के साथ, आप केवल एक डिज़ाइन (Design) ही नहीं बना सकते बल्कि एक दृष्टिकोण भी बना सकते हैं, जो बाकियों से पूरी तरह से भिन्न है। आमतौर पर कई लोगों द्वारा प्रिंटमेकिंग और प्रिंटिंग (Printing) को कभी-कभी एक सा मान लिया जाता है, लेकिन वास्तव में इन दोनों में बहुत अंतर है। प्रिंटिंग, मुद्रणालय की तकनीक के माध्यम से मुद्रित सामग्री के उत्पादन की प्रक्रिया है जबकि प्रिंटमेकिंग आमतौर पर कागज, कपड़े आदि पर छपाई द्वारा कलाकृतियां बनाने की प्रक्रिया है।

प्रिंटमेकिंग में मूल रूप से एक सांचे (यह अनिवार्य रूप से एक टेम्पलेट (Template) होता है, और इसे लकड़ी, धातु या कांच से बनाया जा सकता है।) के माध्यम से छवियों को किसी अन्य सतह (मुख्यतः कागज या कपड़े) पर स्थानांतरित किया जाता है। वहीं पारंपरिक प्रिंटमेकिंग तकनीकों में लकड़ी के साँचे, नक़्क़ाशी, उत्कीर्णन और पाषाणलेखन शामिल हैं, जबकि आधुनिक कलाकारों ने स्क्रीन-प्रिंटिंग (Screen Printing) को शामिल करने के लिए उपलब्ध तकनीकों का विस्तार किया है। उपकरणों या रसायनों के साथ सांचे की सपाट सतह पर काम करके डिज़ाइन को सांचे पर बनाया जाता है। वांछित सतह पर इसे स्थानांतरित करने के लिए सांचे पर स्याही लगाई जाती है। सांचे से प्रिंट करने के लिए नियंत्रित दबाव के अनुप्रयोग की आवश्यकता होती है, जिसे अक्सर प्रिंटिंग प्रेस का उपयोग करके हासिल किया जाता है, जो कागज या कपड़े पर मुद्रित होने पर डिजाइन का एक समान प्रभाव पैदा करता है (अधिक आधुनिक प्रिंटमेकिंग तकनीक, जैसे स्क्रीन-प्रिन्टिंग, को एक प्रेस की आवश्यकता नहीं होती है)। परिणामस्वरूप प्राप्त प्रिंट अक्सर सांचे पर मूल डिजाइन की दर्पण छवि होती है। प्रिंटमेकिंग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि एक ही डिज़ाइन के कई प्रभाव एकल सांचे से प्रिंट किए जा सकते हैं।

प्रिंटमेकिंग तकनीकों को आमतौर पर निम्नलिखित मूल श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

रिलीफ (Relief) :
इसमें स्याही, सांचे की मूल सतह पर लगाई जाती है। इस तकनीक में वुडकट या वुड ब्लॉक (Block) शामिल हैं जैसा कि इन्हें एशियाई रूपों में आमतौर पर लकड़ी के उत्कीर्णन, लीनोकट (Linocut) और मेटलकट (Metalcut) के नाम से जाना जाता है।

इंटाग्लियो (Intaglio):
इसमें स्याही को सांचे की मूल सतह के नीचे लगाया जाता है। इंटाग्लियो (Intaglio) तकनीक में उत्कीर्णन, नक़्क़ाशी, मेज़ोटिन्ट (Mezzotint), एक्वाटिंट (Aquatint) शामिल हैं।

प्लानोग्राफिक (Planographic) :
इस विधि में सांचा अपनी मूल सतह को बनाए रखता है, लेकिन छवि के हस्तांतरण के लिए अनुमति देने के लिए विशेष रूप से तैयार स्याही का उपयोग किया जाता है। इसमें लिथोग्राफी (Lithography), मोनोटाइपिंग (Monotyping) और डिजिटल (Digital) तकनीक शामिल हैं।

स्टेंसिल (Stencil) :
इसमें स्याही या पेंट (Paint) को तैयार स्क्रीन के माध्यम से दबाया जाता है, जिसमें स्क्रीन प्रिंटिंग और पॉचोइर (Pochoir) शामिल हैं।

वुडकट (एक प्रकार का रिलीफ प्रिंट) सबसे शुरुआती प्रिंटमेकिंग तकनीक है, और सुदूर पूर्व में पारंपरिक रूप से उपयोग की जाती है। इसे संभवतः कपड़े पर मुद्रण पैटर्न (Pattern) के साधन के रूप में विकसित किया गया था, और 5वीं शताब्दी तक चीन में कागज पर किसी विषय और चित्र छपाई के लिए इसका उपयोग किया जाता था। जापान में 1400 के आसपास कागज पर छवियों के वुडकट विकसित हुए और यह कुछ ही समय बाद यूरोप में भी उपयोग किए जाने लगे। कलाकार द्वारा लकड़ी के तख़्त पर या कागज पर एक डिज़ाइन बनाया जाता है, जिसे लकड़ी में स्थानांतरित किया जाता है।

इसी प्रकार प्रिंटमेकिंग की नक़्क़ाशी तकनीक इंटाग्लियो परिवार का हिस्सा है तथा माना जाता है कि इस प्रक्रिया का आविष्कार जर्मनी के ऑग्सबर्ग (Augsburg) के डैनियल होफर (Daniel Hofer) (1470–1536) ने किया था, जिन्होंने कवच को इस तरीके से सजाया और उसमें प्रिंटमेकिंग की विधि लागू कर दिया। इस तकनीक का फायदा यह था कि ड्राइंग (Drawing) में प्रशिक्षित कलाकार के लिए इसे सीखना आसान है। नक़्क़ाशीदार प्रिंट आमतौर पर रैखिक होते हैं और अक्सर इसमें बारीक विवरण और आकृति होती है। प्रिंटमेकिंग की लिथोग्राफी तकनीक का आविष्कार 1798 में एलो सिनफेल्डर (Alois Senefelder) द्वारा किया गया था और यह तेल और पानी के रासायनिक प्रतिकर्षण पर आधारित है। इसमें एक छिद्रपूर्ण सतह, आमतौर पर चूना पत्थर का उपयोग किया जाता है। छवि को तेलीय माध्यम के साथ चूना पत्थर पर रेखांकित किया जाता है। चूना-संरक्षित डिजाइन को चूना पत्थर में स्थानांतरित करते हुए, अम्ल का इस्तेमाल किया जाता है, जिसके बाद छवि को सतह में जलता हुआ छोड़ दिया जाता है। इसके बाद इस पर पानी में घुलनशील पदार्थ ‘गम अरेबिक (Gum Arabic)’ का इस्तेमाल कर पत्थर की सतह को सील (Seal) कर दिया जाता है। पत्थर की सतह पर केवल पानी रहता है तथा यह चित्रकारी के तेल आधारित अवशेषों में शामिल नहीं होता। इसके बाद तेल की स्याही को पूरी सतह को आवरित करने वाले रोलर (Roller) के साथ लगाया जाता है। चूँकि पानी स्याही में तेल को पीछे धकेलता है, इसलिए स्याही छवि को रंजित करते हुए केवल तेलमय भाग पर चिपकती है। सूखी कागज की एक पर्ण को सतह पर रखा जाता है, और फिर प्रिंटिंग प्रेस के दबाव से छवि को कागज में स्थानांतरित किया जाता है। लिथोग्राफी को छायांकन और बहुत छोटे विवरण में महीन वर्गीकरण को ग्रहण करने की क्षमता के लिए जाना जाता है। इसी प्रकार से उत्कीर्णन की प्रक्रिया को जर्मनी में 1430 के दशक में सुनार द्वारा इस्तेमाल की गई नक्काशी से विकसित किया गया था। इसमें कठोर लोह उपकरण जिसे बरिन (Burin) कहा जाता है, का उपयोग एक धातु प्लेट (Plate) की सतह में डिज़ाइन को काटने के लिए किया जाता है।

कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए एक साधन के रूप में प्रिंटमेकिंग, जैसा कि आज मान्यता प्राप्त है, भारत में 80 साल पहले उभरा। गैस्पर डी लियो (Gaspar de Leo) द्वारा क्रिश्चियन लाइफ का आध्यात्मिक संग्रह (Spiritual Compendium of Christian Life), 1561 में गोवा में छपा था। इस पुस्तक को भारत में सबसे पुराने जीवित मुद्रित संकलन के रूप में दर्ज किया गया है। पारंपरिक द्वार या प्रवेश द्वार की एक छवि का चित्रण वुडब्लॉक की सहायक तकनीक का उपयोग करके करी गई थी। इंटाग्लियो प्रिंटिंग की प्रक्रिया भारत में डेनिश मिशनरी, बार्थोलोमेव ज़ेगेनबल्ग (Danish missionary, Bartholomew Zegenbalg) द्वारा शुरू की गई थी। उन्होंने द एवेंजेलिस्ट्स एंड द एक्ट्स ऑफ द एपॉस्टल्स (The Evangelists and the Acts of The Apostles,) नाम की एक पुस्तक प्रकाशित की जो कि ट्रानकेबर (Tranquebar- तमिलनाडु में एक जिला, जो उस समय डेनमार्क का उपनिवेश था) में छपी थी। इस पुस्तक के शुरुआती पृष्ठ में भूरे रंग की छाया में एक नक़्क़ाशी छापी गई थी। यह भारत में रंग मुद्रण के पहले दर्ज उदाहरणों में से एक बनी। ज़ेगेनबल्ग की एक अन्य पुस्तक ग्रामटिका डामुलिका (Gramatica Damulica), प्लेट उत्कीर्णन का सबसे पहला उदाहरण प्रदर्शित करती है। एक प्रारम्भिक मुद्रित चित्रण (वुड ब्लॉक प्रिंट), 1806 में तंजौर में छपी बालबोध मुक्तावाली नामक पुस्तक में पायी जा सकती है।

हालाँकि, एक भारतीय कलाकार द्वारा छापे गए चित्रण का पहला उदाहरण बंगाली पुस्तक ओनूदाह मोंगल (Annada Mangal) का हिस्सा था। यह पुस्तक गंगा किशोर भट्टाचार्य द्वारा प्रकाशित की गई थी और 1816 में कलकत्ता के फेरिस एंड कंपनी (Ferris & Company) प्रेस में छपी थी। इस पुस्तक में अभिलेखों के साथ दो उत्कीर्ण चित्र हैं। कलकत्ता में इंटाग्लियो प्रिंट के प्रकाशनों का अध्ययन करने के बाद, यह स्पष्ट है कि इंटाग्लियो प्रिंट प्रेस 1780 के दशक तक शहर में अच्छी तरह से स्थापित हो गए थे। कोलकाता में बटाला 19वीं शताब्दी में भारतीय प्रिंटमेकिंग गतिविधियों का केंद्र था। वहीं राजा रवि वर्मा भारत के पहले कलाकार थे जिन्होंने प्रिंटमेकिंग का इस्तेमाल किया, न केवल अपने आप में एक कलात्मक माध्यम के रूप में, बल्कि अपनी कला को जन-जन तक पहुँचाने के लिए। अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए, उन्होंने 19वीं शताब्दी के अंत में अपना स्वयं का लिथोग्राफिक प्रेस स्थापित किया, जिसे बॉम्बे के घाटकोपर में रवि वर्मा प्रेस के नाम से जाना जाता था। यहाँ उन्होंने अपने कई धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष चित्रों की नकल की और उन्हें चमकदार आत्मकथाओं के रूप में छापा। 1919 में टैगोर द्वारा स्थापित कला भवन की स्थापना के साथ ललित कला माध्यम के रूप में प्रिंटमेकिंग की प्रथा ने अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की। भारत में प्रिंटमेकिंग को एक कला के रूप में पोषण प्रदान करने का श्रेय बंगाल के प्रसिद्ध कलाकार सोमनाथ होरे को जाता है, जिन्होंने कृष्ण रेड्डी, जैसे एक अग्रणी प्रिंटमेकर से मार्गदर्शन प्राप्त किया था। होर प्रिंट्स के साथ अपने प्रयोगों के लिए जाने जाते थे। प्रिंट कला को आगे ले जाने वाले सनत कर थे, जिन्होंने कला को गैर-पारंपरिक रूपों से उठाया और इंटाग्लियो प्रिंट बनाने के साथ प्रयोग किया। इनके अलावा कंवल कृष्ण एक अन्य प्रसिद्ध कलाकार थे, जिन्होंने अपने प्रिंट्स को चमकदार रंगों, उभरी हुई सतहों और एक विशेष आकर्षण के साथ उभारकर हलचल मचा दी। यूरोप जाकर उन्होंने इंटाग्लियो प्रिंटिंग तकनीक सीखी तथा वापस आकर अपना प्रेस स्थापित किया और प्रिंटों में बहु-रंग होने का चलन शुरू किया।

केजी सुब्रमण्यन जैसे जाने-माने वरिष्ठ कलाकारों के पास प्रसिद्ध कला संस्थान शांतिनिकेतन में लिथोग्राफिक प्रिंट और फोलियो (Folio) के विशिष्ट निकाय हैं। के जी सुब्रमण्यम द्वारा प्रशिक्षित एक अन्य कलाकार लक्ष्मण गौड़ हैं, जिन्होंने प्रिंटमेकिंग को भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय कला प्रेमियों तक ले जाने में उत्कृष्ट योगदान दिया है। इसी प्रकार से अनेक भारतीय कलाकारों और उनके चित्रों ने भारत में कला के रूप में प्रिंटमेकिंग को प्रोत्साहित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हाल के वर्षों में, कंप्यूटर ग्राफिक्स (Computer Graphics), विभिन्न सॉफ्टवेयर प्रोग्राम (Software Programs), स्कैनर (Scanners) और प्रिंटर के आगमन के साथ, प्रिंटमेकिंग की धारणा प्रभावशाली रूप से बदल गई है। लोगों द्वारा शास्त्रीय हस्त निर्मित दृष्टिकोणों को अब पूरी तरह से स्वचालित रूप में बदल दिया गया है। कंप्यूटर पर बनाई गई छवियों के प्रिंट अब एक बटन के दबाने पर बनाए जा सकते हैं।

संदर्भ :-
https://en.wikipedia.org/wiki/Printmaking
https://www.mojarto.com/blogs/printmaking-contemporary-indian-artists-transform-imprints-from-communication-to-art-part-i
https://www.saffronart.com/sitepages/printmaking/history.aspx
https://www.metmuseum.org/about-the-met/curatorial-departments/drawings-and-prints/materials-and-techniques/printmaking

चित्र सन्दर्भ :
मुख्य चित्र में प्रिंटमेकिंग की विभिन्न विधाओं को चित्रित किया गया है। (Prarang)
दूसरे चित्र में गुटेनबर्ग की प्रिंटिंग प्रेस की प्रति को दिखाया गया है। (Pikist)
तीसरे चित्र में वुडब्लॉक प्रिंटिंग के एक नमूने के तौर पर मार्टिन  लूथर (Martin Luther) की बाइबिल को दिखाया गया है। (Wikimedia)
चौथे चित्र में रिलीफ प्रिंटिंग का एक उदाहरण दिखाया गया है। (Youtube)
पांचवें चित्र में इंटेग्लिओ तकनीक को दिखाया गया है। (Flickr)
छठे चित्र में प्लेनोग्राफिक प्रिंटिंग को दिखाया गया है। (Youtube)
सातवें चित्र में स्टैंसिल के द्वारा प्रिंटमेकिंग की प्रक्रिया को दिखाया गया है। (Flickr)
अंतिम चित्र में अक्वाटिंट (Aquatint), प्रिंटमेकिंग का एक उदाहरण है। (publicdomainpictures)



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