जौनपुर और कल्पसूत्र

जौनपुर

 14-04-2017 12:00 AM
मध्यकाल 1450 ईस्वी से 1780 ईस्वी तक
प्राचीन काल से ही इतिहास जानने के श्रोतों में पांडुलिपियों का अहम् योगदान रहा है, ना केवल जानने में परन्तु उनकी पुष्टि करने में भी इनके योगदान को कतिपय कम नहीं आँका जाना चाहिए। कई काव्य, महाकाव्य, कहानियां एवं श्रुतियों को पांडुलिपियों में ही संगृहीत किया गया है। कई पुरातात्त्विक एवं ऐतिहासिक अध्ययनों से यह पांडुलिपियाँ प्रकाश में आई, इनमे से ही एक महत्वपूर्ण पाण्डुलिपि जौनपुर से मिली है (1465) जो की जैन धर्म से सम्बन्ध रखती है। वर्तमान समय में यह पाण्डुलिपि बर्लिन म्यूजियम के एशियाई आर्ट्स विभाग में संरक्षित है। इस पाण्डुलिपि का नाम कल्प्सूत्र है जो महावीर जैन की माँ के १४ महत्वपूर्ण सपनो पर आधारित है। इसमें ८६ जिल्द हैं। कपिल वात्स्यायन की पुस्तक “डांस इन इंडियन पेंटिंग्स”अभिनव प्रकाशन, में इस पाण्डुलिपि की विशेषता वर्णित है। इसको बनाने में सोने और लाजवर्द से कागज पर छाप कर बनाया गया है। तथा यह जौनपुर चित्रकारी कला का अनुपम उदाहरण है। उस वक़्त जौनपुर पर हुसैन शर्की का शासन था जो वास्तुकला व चित्रकला के लिए जौनपुर के उत्तम कालों में से था। इसी प्रकार के कुछ साक्ष्य मध्यप्रदेश के मांडू से मिलते हैं। इस पाण्डुलिपि को बनवाने का श्रेय श्राविका हर्शिनी को जाता है जो सहसराज नामक व्यापारी की पुत्री तथा संघवी कालिदास की पत्नी थी जो की श्रीमाली जाती से सम्बन्ध रखता था। इस पाण्डुलिपि को चित्रित करने वाले चित्रकार का नाम कायस्थ बेनिदास था जो पंडित कर्मसिम्ह गौड़ का पुत्र था। इस पाण्डुलिपि की ख़ास बात यह है की इसके बनाने में प्रयुक्त सामग्री व कला अपने आप में अद्भुत है।

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