परी कथा से कम नहीं है- भारतीय आभूषणों का इतिहास

जौनपुर

 29-06-2020 10:20 AM
म्रिदभाण्ड से काँच व आभूषण

5000 सालों में फैली भारतीय आभूषणों की विरासत देश के सौंदर्य और संस्कृति के इतिहास की एक बानगी प्रस्तुत करते हैं। विभिन्न कालों, स्थानों से बचे हुए थोड़े से जवाहरात जिन का गुणगान साहित्य, मिथक, किंवदंतियों, रत्न शास्त्र, इतिहास में इस प्रकार हुआ है कि वह एक ऐसी परंपरा के प्रमाण बन गए हैं जिसका दूसरा उदाहरण सम्पूर्ण दुनिया में कहीं नहीं मिलता। 2000 वर्ष से ज्यादा समय तक भारत एकमात्र देश था जिसने सारे विश्व को जवाहरात दिए शायद इसीलिए भारत को सोने की चिड़िया भी कहा जाता था। गोल्कोंडा हीरे, कश्मीर के नीलम और मन्नार की खाड़ी के मोती की बड़ी मांग थी और इनके लिए व्यापारी जमीन तथा समुद्र की सीमाएं पार करके भारत आते थे। शासकों के लिए जवाहरात शक्ति, समृद्धि और प्रतिष्ठा के प्रतीक थे। भारतीय महिलाओं के लिए जेवरात एक महत्पूर्ण परिधान था। कुछ अन्य क्षेत्रों में इन्हें सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा से जोड़ा जाता था। जिस बात के लिए,विश्व पटल पर हमेशा ही भारत का नाम याद किया जाता है, वह है बेशकीमती कोहिनूर (होप डाइमंड, विश्व का सबसे बड़ा ब्लू डायमंड)।

आभूषणों के प्रति भारत के लगाव की कहानी 5000 साल पहले सिंधु घाटी में शुरू हुई। भारत विश्व का सबसे बड़ा मोतियों का उत्पादक और निर्यातक था। भारत हीरों का घर था और भारत में ही डायमंड ड्रिल (Diamond Drill) का आविष्कार किया गया था, भारत ही था जिसने रोम को यह तकनीक सिखाई थी। सिंधु घाटी सभ्यता के शिल्पिओं ने सेमी प्रेशियस स्टोन्स (Semi Precious Stones) का प्रयोग किया जैसे इंद्रगोप (Carnelian), सुलेमानी पत्थर, फिरोजा, बेल-बूटे गढ़े चीनी मिट्टी के बर्तन, साबुन का पत्थर और इन्हें घुमावदार और पीपे के आकार में बनाकर नक्काशी, पट्टियों, बिंदुओं और नमूनों से सजाया जिसमें बहुत बारीकी और महीन ढंग से सोने का भी प्रयोग किया गया। जहां तक सिंधु घाटी के आभूषणों का प्रसंग है जो वहां के निवासी बनाते और पहनते थे, तो वे परिष्कृत रुचि वाले थे और सौंदर्य को लेकर बहुत जागरूक थे। निर्माण का कौशल भी उनकी एक महत्वपूर्ण खूबी था, उदाहरण के लिए दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा वह हार है जो मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिला था। 5000 साल पुराने इस हार के किनारों पर सुलेमानी पत्थर के पेंडेंट और मनकों की माला है जो बहुत ही मजबूत सोने के तार के द्वारा अत्यंत कुशलता से मनकों के बीच बनाए छेदों में से पिरोई गई है।

सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के 2000 साल बाद भारतीय कारीगरों ने अपने कौशल को जबरदस्त रूप से चमकाया। उस काल के आभूषणों में सोने पर महीन चांदी का नाजुक शिल्प, उभार और कान के कुंडल और पेंडेंट में बारीक दानेदार काम मिलता है। दक्षिण भारत, मध्य भारत, बंगाल और उड़ीसा ने भी ज्वेलरी डिजाइनिंग (Jewelery Designing) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन गहनों की शुरुआत मूर्तियों पर सजाने से शुरू हुई लेकिन समय बीतने के साथ मंदिर की नर्तकियों ने भी असली आभूषणों की जगह नकली गहने पहनने शुरू कर दिए। जैसे-जैसे भरतनाट्यम नृत्य की लोकप्रियता बढ़ी, टेंपल ज्वेलरी भी ना सिर्फ लोकप्रिय हुई बल्कि जल्द ही पीढ़ी दर पीढ़ी टेंपल ज्वेलरी को विरासत में देने का चलन चल पड़ा।

मुगल शासन काल में भारतीय आभूषणों की दुनिया
भारतीय गहनों की दुनिया में नई चकाचौंध लेकर आए मुगल शासन काल के दौरान बनने वाले गहने। इस दौर में एक नए प्रकार के गहनों को जन्म दिया गया जिसमें भारतीय और मध्य एशियाई गहनों की बारीकियों का अनोखा संगम था। हालांकि गहने बनाने की प्रक्रिया में एनेमल (enamel ) का काम सबसे पहली बार तक्षशिला के पौराणिक शहर में हुआ था लेकिन इस कारीगरी को फर्श से अर्श तक पहुंचाने का श्रेय मुगल काल को ही जाता है। कुंदन कारीगरी में जवाहरातों को सोने में जड़ने की कला को पूर्णता तक पहुंचाने का श्रेय मुगल काल के कारीगरों को ही जाता है। एक और तकनीक जो मुगलों ने इजाद की थी वह थी सोने के बीच कीमती पत्थरों को जड़ना। मुगल काल के गहनों के डिजाइन में कुछ रंग हाथ से संपन्न किये जाते थे जैसे हरा, लाल और सफेद जिसके कारण पन्ना, रूबी और हीरो का जमकर इस्तेमाल होता था। यह कीमती पत्थर संपन्नता और सम्मान के प्रतीक होने के साथ-साथ आध्यात्मिक महत्व भी रखते थे। इन कीमती पत्थरों में से मुगल दरबार में सबसे ज्यादा लोकप्रियता था पन्ना, जिसे मुगल शासक चाँद के आंसू (Tears of the Moon) कहते थे।

जड़ाऊ कारीगरी के लिए माना जाता है कि भारत में यह मुगल शासन की ही देन है लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि राजस्थान और गुजरात के भर्ती कारीगरों ने जड़ाऊ कला में न सिर्फ महारत हासिल की बल्कि अपनी विशिष्ट छाप भी छोड़ी। कारीगरी की प्रक्रिया में सोने को गर्म करने के पश्चात पीट कर काम में लाया जाता है जिससे डिजाइन का सांचा और उसकी रूपरेखा बनती है। खोखले सांचे में डालकर कीमती पत्थरों को डिजाइन के अनुसार जड़ा जाता है, एक बार जब यह पत्थर जड़ जाते हैं तो बिना किसी गोंद की मदद के सहारे सिर्फ गरम सोने के इस्तेमाल से कारीगर मीनाकारी का काम करता है जिसमें कभी-कभी एक ही गहने को डिजाइन करने में घंटों लग जाते हैं। कहते हैं कि जहांगीर के राज में मुगल दरबार की वेशभूषा के तौर तरीकों में नाटकीय रूप से बदलाव आया जो कि जहांगीर से जुड़ी कलाकृतियों में साफ दिखाई देता है। इससे पहले बादशाह अकबर का रुझान ईरानी फैशन की ओर था जो कि उनकी पगड़ी में लगे पंख से साफ दिखता था। आगे चलकर शाहजहां का रुझान यूरोपीय फैशन की ओर हुआ, खासकर पुर्तगाली ज्वैलर अर्नाल्ड लुल्स (Portuguese Jeweler Arnold Lulls)द्वारा डिजाइन किए गए गहनों के प्रति। कहा जाता है कि शाहजहां ब्रिटेन के राजा जेम्स प्रथम (King James I) द्वारा पहने गए गहनों से बहुत प्रभावित थे। जैसा कि मुगल दरबार में सर थॉमस रो (Sir Thomas Roe) द्वारा लाई गई पोट्रेट (Portrait) से साफ जाहिर होता है। 1618 की इस पेंटिंग में शाहजहां जोकि उस समय एक युवा राजकुमार ही थे, वह अर्नाल्ड लुल्स द्वारा भारतीय कलाकारी से प्रेरित और आभूषणों से सजे एक डिजाइन को पकड़े दिखाई दे रहे हैं।

ब्रिटिश काल और भारतीय ज्वेलरी का इतिहास
ब्रिटिश राज आने के बाद वक्त ने एक बार फिर एक नई करवट ली और भारतीय आभूषणों के डिजाइन में ब्रिटिश प्रभाव आने लगा। जैसे-जैसे यह डिजाइन बदले, वैसे वैसे भारतीय संस्कृति के ताने-बाने में विविधता और बढ़ी । उस समय के मशहूर यूरोपियन ज्वेलरी ब्रांड में से एक कार्टियर (Cartier) ने भारत के महाराजाओं के लिए खास डिजाइनर गहने बनाने शुरू किए। इस ब्रांड की विशेषता थी भारत से प्रेरित गहनों के डिजाइन में कीमती पत्थर जड़ कर बेचना। इस कंपनी का काम पेरिस (Paris, France) में होता था।

श्रृंगार की कला के इतिहास की शुरुआत शायद आदिमानव के समय से हुई थी जिसने सजावट के लिए फूलों, मोतियों, तराशी हुई लकड़ी, सीप, हड्डी, पत्थर का इस्तेमाल किया। समय के साथ श्रृंगार की सामग्री में बदलाव आया और हाथी दांत, तांबा और सेमी प्रेशियस पत्थर आदि शामिल हुए। इसके बाद के बदलाव में चांदी, सोना और कीमती पत्थरों ने अपनी जगह बनाई लेकिन हमारी समृद्ध आदिवासी सभ्यता का प्रतीक फूलों से प्रेरित ज्वेलरी डिजाइन में आज भी सदियों पुरानी सादगी साफ झलकती है। भारतीय इतिहास उतना ही पुराना है जितना पुराना भारतीय सभ्यता का इतिहास है। 5000 साल पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों में बीडेड ज्वेलरी के इस्तेमाल के प्रमाण मिले हैं। भरुत, साँची और अमरावती के अलावा अजंता के चित्रों में चित्रित आदमी और औरतों को विभिन्न प्रकार के गहने पहने देखा जा सकता है। इसमें राजा से लेकर प्रजा तक सभी शामिल हैं।

पौराणिक काल से ही गहने श्रृंगार की सामग्री नहीं थे, यह भी माना जाता था कि उनमें एक आध्यात्मिक और बुरी आत्माओं से बचाव की ताकत होती थी। उदाहरण के तौर पर नवरत्न जड़े गहने ग्रह शांति के लिए आज भी पहने जाते हैं। मणिरत्न, रुद्राक्ष, तुलसी के बीज, चंदन के बीज से बनी माला का इस्तेमाल आज भी हिंदुओं द्वारा पूजा में किया जाता है। आगे चलकर गहने काफी हद तक बचत का साधन भी बन गए खासकर महिलाओं के द्वारा गहनें आर्थिक सुरक्षा का ऐसा जरिया बने जिसे मुसीबत के वक्त गिरवी रखकर या बेच कर अपनी जरूरत को पूरा किया जा सके।

भारतीय संस्कृति की विविधता के दुर्लभ प्रतीक
सरपेच (Sarpech) नाम का गहना राजस्थान की ऐतिहासिक खासियत है। अजंता की दीवारों पर बनी कलाकृतियों में सरपेच जैसे सिर पर पहनने वाले गहनों को पहने महिलाओं की कई तस्वीरें हैं जो लगभग 2000 साल पुरानी है। यह कला भी अपनी परिपक्वता में मुगल काल में ही पहुंची और इसने खासकर पुरुषों की पगड़ी को सुशोभित करने वाले गहने के रूप में अपनी जगह बनाई।

बाजूबंद नाम का गहना पूरे भारतवर्ष में अलग-अलग प्रांतों में महिलाएं अपने बाजुओं पर धारण करती हैं लेकिन दक्षिण भारत के बाजूबंद वनकी की बात ही कुछ अलग है, यह अंग्रेजी के v अक्षर के आकार का होता है और इसमें फन फैलाए कोबरा भी बना होता है जिसे शेषनाग का प्रतीक माना जाता है जिस पर भगवान विष्णु विराजते हैं। दक्षिण भारत का एक और पौराणिक महत्व वाला गहना है ‘लिंगपद कक्का मुथु मलाई’ (मोतियों की माला जिसमें शिव के प्रतीक लिंगम का पेंडेंट होता है)। यह तमिलनाडु का प्रमुख गहना है।

इनके अलावा कुछ गहने ऐसे भी हैं जिन्होंने सदियां और शासनकाल बदलने के बावजूद अपना अस्तित्व बनाए रखा, जैसे कि नाक में पहनने वाली नथ, जड़ानगम ( बालों की चोटी में पहने जाने वाला गहना), शिंका (गुजरात का गहना जो महिलाओं द्वारा सिर पर पहना जाता है, इसमें सोने की चेन पर कई मोर बने होते हैं), दामनी ( गुजरात का प्रसिद्ध , बालों में पहने जाने वाला गहना), चंद्र हार( बंगाल), हथफूल( यानी हाथों का गहना), इसके अलावा कई तरह की पायलें भी हैं जो भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जानी जाती हैं जैसे- पायल, पायजेब, संकला, छनजर,ज़ंजीरी,गोलुसू और कप्पू आदि।

चित्र सन्दर्भ:
1. मुख्य चित्र में भारतीय महिलाओं को उनके जेवरात के साथ दिखाया गया है। (Wikimedia)
2. दूसरे चित्र में कोहिनूर और ब्रिटेन के राजसी ताज में कोहिनूर को जड़ा हुआ दिखाया गया है। (Wikimedia)
3. तीसरे चित्र में सिंधु घाटी के सभ्यता से जुड़े हुए गहने दिखाए गए हैं, जो हड़प्पा से प्राप्त हुई हैं। (Youtube)
4. चौथे चित्र में टेम्पल ज्वेलरी का एक उदहारण दिखाया गया है। (Flickr)
5. पांचवे चित्र में मुग़ल काल में विकसित की गयी कुंदन विधि से तैयार किये गए, कान के झुमकों का चित्र है। (Publicdomainpictures)
6. छटे चित्र में मुग़ल काल से प्राप्त कुंदन का एक हार दिखाई दे रहा है। (Wikipedia)
7. सांतवा चित्र में भारतीय समाज में गहनों के महत्व को प्रदर्शित कर है। (Prarang)
8. आठवाँ चित्र सरपेच नामक गहने को प्रदर्शित कर रहा है, जो पुरूषों की पगड़ी में लगाने के काम आता है। (Unsplash)

सन्दर्भ:
1. https://www.thebetterindia.com/86147/history-indian-jewellery-jewels-traditions/
2. https://www.utc.edu/faculty/sarla-murgai/traditional-jewelry-of-india.php
3. https://www.indianetzone.com/1/jewellery_moghul_period.htm



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