शेवरॉन पैटर्न और जौनपुर में वास्तुकला का रोचक इतिहास

जौनपुर

 04-06-2020 01:00 PM
वास्तुकला 1 वाह्य भवन

वास्तुकला के शेवरॉन पैटर्न (Chevron pattern) आज हमारे लिए भूली बिसरी याद हो गए हैं लेकिन एक समय में इनकी दुनिया भर में धूम थी। ताजमहल की तरह ही जौनपुर के संस्थापक फिरोज शाह के मकबरे पर इस पैटर्न का बहुत कौशल के साथ प्रयोग हुआ था। थोड़ी दूरी से इसे देखने से त्रिआयामी प्रभाव महसूस होता है। बात हो रही है शर्की साम्राज्य की जो ताजमहल से 250 साल पुराना था। उस समय शेवरॉन पैटर्न्स का इस्तेमाल बहुत प्रगतिशील था। कैसे ये पैटर्न यूरोप के मध्य युगीन निर्माण में फर्श की सजावट का हिस्सा बना और इस्लाम में मध्य पूर्व और भारत के वास्तु को प्रेरित किया , इसका अपना इतिहास है। आज के आधुनिक समकालीन डिजाइनों में ये पैटर्न काफी लोकप्रिय है।

फिरोजशाह का मकबरा
ये मकबरा जौनपुर गोरखपुर मार्ग पर स्थित सिपह मोहल्ला के नजदीक बना हुआ है। फिरोजशाह छोटगई के सुल्तान के वंशज थे और 1526 CE में पहले मुगल शासक जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर की सेना के साथ दिल्ली पहुंचे।बाबर के आदेश पर उन्होंने 10 हजार सैनिकों के साथ अफगान विद्रोह को कुचलने के लिए जौनपुर कूच किया। लेकिन अफगानों ने उन्हें हरा दिया और वो वापस दिल्ली लौट आए। बाद में बाबर खुद एक विशाल सेना के साथ जौनपुर गए और विद्रोहियों पर जीत हासिल की। जीत के बाद बाबर ने फिरोजशाह को जौनपुर का गवर्नर नियुक्त किया और उन्होंने जौनपुर शहर को उसकी खोई हुई गरिमा वापिस लौटाई।

जौनपुर 11 वीं शताब्दी में स्थापित हुआ लेकिन गोमती की बाढ़ में बह गया। 1359 में फिरोजशाह तुगलक ने इसका पुनर्निर्माण कराया।वाराणसी जिले के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र में स्थित जौनपुर गोमती नदी के तट पर बसा है। यहां अनेक पर्यटन स्थल हैं जैसे सदर इमामबाड़ा, जामी मस्जिद, खालिस मुखलिस मस्जिद, शीतला चौकिया धाम, शर्की सामराज्य के 7 सम्राटों का कब्रिस्तान झांझरी मस्जिद , लाल दरवाजा मस्जिद आदि।

हाल के वर्षों में शेवरॉन और हियरिंग बोन (Herring bone) नमूनों से लकड़ी के फर्शों का निर्माण बहुत ज्यादा प्रचलित हो गया है। एक निश्चित स्थान में ये ज्यामितीय नमूने आखों को लुभाते हैं और शानदार यूरोपीय आभास भी देते हैं।लेकिन ये नमूने आए कहां से? इनके पीछे बहुत दिलचस्प कहानियां हैं जो वास्तु शास्त्र, कपड़ों के नमूनों और कला की दुनिया से जुड़े हैं।

हियरिंग बोन नमूने का इतिहास
हियरिंग बोन नमूने का नामकरण हियरिंग नाम की मछली के कंकाल से मिलते जुलते होने के कारण किया गया है। ये प्राचीन रोमन साम्राज्य में पाए जाते थे। रोमन सड़क निर्माताओं ने ये खोजा कि अगर ईंटों को अंग्रेजी के V अक्षर के नमूने में कंकरीट के फर्श पर लगाकर रखें तो इससे ज्यादा मजबूत सड़क बनेगी। इस तरह की चिनाई को ओपस स्पिकेटम (Opus Spicatum) और लेटिन में स्पाईकड़ वर्क (Spiked Work) कहते हैं।यहां तक कि फिलिप्पो ब्रुनेलेस्की (FILIPPO BRUNELLESCHI) ने इसे फ्लोरेंस (Florence) के गिरजा घर के गुंबद के लिए इस्तेमाल किया था। सड़क बनाने के लिए वो पहले एक परत कंकरीट की बिछाते थे और उसके बाद इंटें नमूने के अनुसार लगाई जातीं। इससे सड़कों को यातायात के दबाव को सोखने में मदद मिलती है और सड़कों के रखरखाव का खर्च भी कम हो जाता है। आप आज भी उन गलियों या सड़कों पर घूम सकते हैं। दूसरी प्राचीन सभ्यताओं में भी ये नमूने इस्तेमाल किए गए, इनमें मिस्त्र के लोग भी शामिल थे जिन्होंने ज्यादातर इस नमूने का उपयोग अभिजात्यों के जेवरात बनाने में किया। ये नमूना आयर्लैंड के हॉर्स हेयर (HORSE HAIR) कपड़े की तरह लगता है और अनुमानतः इसका समय निर्धारण 750 और 600 CE के बीच में हुआ होगा। ये उत्तरी अमेरिका में निर्मित बेंत की बनी टोकरियों में भी दिखाई देता है।

16 वीं शताब्दी में हेयरिंग बोन नमूने लकड़ी के फर्श बनाने में इस्तेमाल होना शुरू हुए। फ्रेंच भाषा में पर्क्युएटरी (PARQUETERY) का मतलब होता है कि कैसे छोटे लकड़ी के टुकड़े काटकर ज्यामितीय नमूने में इस्तेमाल हुए हैं। हेयरिंग बोन और शैवरॉन दोनों नमूने 1600 ईस्वीं में पूरे फ्रांस में बहुत लोकप्रिय रहे। जो सामाजिक स्तर और लालित्य का प्रतीक बन गये थे। सर्वप्रथम निर्मित काठ के हैरिंग बोन पैटर्न के फर्श का उदाहरण शैटॉ डी फ़ोन्टाइनेब्लो (CHATEAU DE FONTAINEBLEAU) स्थित फ्रांसिस वन गैलरी में देखे जा सकते हैं जो 1539 में निर्मित हुआ था। वास्तु शास्त्र के अलावा हैरिंग बोन नमूना कपड़े की डिजाइनिंग में प्रयुक्त होता है और खासकर पुरुषों की पोशाकों में काफी लोकप्रिय है।

शैवरॉन पैटर्न का इतिहास
शैवरॉन पैटर्न का अपना अलग इतिहास है जो मध्यकालीन शौर्य शास्त्र, प्राचीन ग्रीक मिट्टी के पात्र और कपड़ों के व्यापार से शुरू हुआ। शैवरॉन शब्द सबसे पहले 14 वीं शताब्दी में अंग्रेजी में प्रयोग हुआ जो लैटिन के अशिष्ट शब्द ‘केप्रिओ (CAPRIO)’ से निकला था जिसका अर्थ था छत और ये शैवरॉन के दो छतों वाले शहतीर के नमूने से मिलता जुलता है। शैवरॉन का प्रयोग सेना और पुलिस में एक खास पद को चिन्हित करने के नमूने के तौर पर राष्ट्रमंडल देशों और अमेरिका में भी वर्दी की बांह पर प्रदर्शित किया गया।

पार्के काष्ठ फर्श का फिर से आगमन
पार्के नमूने का लकड़ी का फर्श 17 वीं और 18 वीं शताब्दी में लोकप्रिय था। 1930 के दशक में ये इंग्लैंड और उत्तरी अमेरिका में प्रयोग होता रहा, जबतक कि क्रत्रिम कपड़े के कालीन की खोज नहीं हुई क्योंकि लागत में वो काफी सस्ता था। 1980 के दशक तक ये खूबसूरत पार्के नमूने कालीन के नीचे दबे रहे जबतक की इन नमूनों को फिर से खोलकर प्रदर्शित करने का चलन शुरू नहीं हो गया।आज फर्श के लिए पार्के नमूने फिर से फैशन में शैवरॉन और हेरिंग बोन के साथ मांग में हैं। क्या अंतर है शेवरॉन और हैरिंग बोन नमूनों में?

हालांकि दोनों नमूने शानदार पार्के नमूने का हिस्सा हैं लेकिन फिर भी उनमें अंतर है।हेरिंग बोन टुकड़े आयताकार होते हैं और 90 डिग्री के कोण पर काटे जाते हैं, शेवरॉन के टुकड़े 45 डिग्री कोण से अंतिम हिस्से में काटकर एकसाथ जोड़ दिए जाते हैं जिससे एक ज़िगज़ैग (ZIGZAG) नमूना तैयार हो जाता है। शैवरॉन नमूने देखने में ज्यादा आधुनिक और ज्यामितीय अनुभूति देते हैं जबकि हेरिंग बोन नमूने ज्यादा पारंपरिक और धरोहर या विरासत का प्रभाव देते हैं। दोनों में से किसी का भी चयन करके चिर स्थाई काष्ठमय फर्श बना सकते हैं जो देखने वाले को गर्माहट और एक विशिष्ट अनुभित प्रदान करता है।

हेरिंग बोन, शैवरॉन और पार्क काष्ठ फर्श को लगाना और बाद में उसकी देखभाल
तीनों पैटर्न के फर्श को लगाने में बहुत समय लगता है। एक एक टुकड़ा निकालकर बहुत सही तरीके से उसे लगाना होता है,ये देखते हैं कि पूरा नमूना कमरे की बनावट के साथ पूरा तालमेल बनाए रखे। आमतौर पर ये टुकड़े कंक्रीट के फर्श या लकड़ी के फर्श पर चिपकाए जाते हैं। उसके बाद इन्हें एक साथ लगाया जाता है। वैसे तो पूरा तरीका ठीक से समझकर भी इस पैटर्न को लगाया जा सकता है, लेकिन अच्छा यही रहता है कि इस पैटर्न को एक प्रशिक्षित व्यक्ति के द्वारा लगवाया जाए ताकि मन माफिक परिणाम मिले। पार्क विधि से तैयार फर्श अन्य लकड़ी के फर्शों की तरह ठीक से देखभाल करते रहने पर कई दशकों तक अपनी खूबसूरती बनाए रखते हैं।इनकी साफ सफाई नियमित करनी होती है। इन्हें नम या गीला नहीं छोड़ना चाहिए, तुरंत साफ करना चाहिए। फर्नीचर के नीचे पैड्स लगाने चाहिए और अगर भारी ट्रैफिक के नजदीक घर है तो इसपर गलीचा बिछा देना चाहिए।

चित्र संदर्भ:
1. मुख्य चित्र में जौनपुर में स्थित फ़िरोज़शाह का मकबरा और (नीचे) शेवरॉन पैटर्न का एक नमूना है। (Prarang)
2. दूसरे चित्र में शेवरॉन पैटर्न में व्यवस्थित ईटों की संरचना है। (pngflix)
3. तीसरे चित्र में मुग़ल वास्तु कला में प्रयुक्त शेवरॉन पैटर्न का एक नमूना है। (Prarang)
4. चौथे चित्र में मुग़ल वास्तु कला में अलंकृत ज्यामितीय संरचना और शेवरॉन पैटर्न दिखाई दे रहे हैं। (Prarang)
5. पांचवे चित्र में शेवरॉन पैटर्न का एक सुन्दर व्यवस्था दिखाई दे रही है। (needpix)
6. छठे चित्र में गुम्बद पर तराशा गया शेवरॉन पैटर्न दिख रहा है। (Prarang)
7. सातवें चित्र में दीवार पर शेवरॉन पैटर्न मुग़ल शेवरॉन पैटर्न की व्यापकता प्रदर्हित कर रहा है। (Prarang)
8. आठवे चित्र में ताजमहल में त्रीआयामी आभास देने वाली शेवरॉन पैटर्न का चित्रण है। (Prarang)
9. अंतिम चित्र में फ़िरोज़शाह के मकबरे का नज़दीकी चित्रण है। (Prarang)
सन्दर्भ:
1. https://www.jaunpurcity.in/2019/02/tomb-of-firoz-shah-jaunpur-india.html
2. https://www.youtube.com/watch?v=oQbsGg2EFPI
3. https://anthologywoods.com/aw-blog/chevrons-herringbone-history-of-these-popular-wood-flooring-patternsand
4. https://bit.ly/3cx18Vh



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