कोरोना वायरस के चलते भारत के अनौपचारिक श्रमिक की दशा

जौनपुर

 27-03-2020 03:00 PM
कीटाणु,एक कोशीय जीव,क्रोमिस्टा, व शैवाल

भारत एक श्रम प्रधान देश है जहाँ पर युवाओं की संख्या अत्यधिक है। अब शिक्षा और नौकरियों की कमी के चलते यहाँ पर श्रमिकों की संख्या अत्यंत बढ़ गयी है। कृषि भारत का प्रमुख आय का स्रोत है तथा कृषि में बड़ी संख्या में मजदूरों की ज़रूरत पड़ती है। इसके अलावा कई उद्योगों आदि में भी मजदूरों की ज़रूरत पड़ती है। इस प्रकार से जब हम आंकड़ों की बात करें तो भारत में कार्यबल का सबसे बड़ा हिस्सा श्रमिक और अनौपचारिक क्षेत्र से ही सम्बंधित है। इसी दिए गए प्रतिशत में वे लोग भी आते हैं जो कि अपना खुद का कुछ व्यापार या स्वरोज़गार करते हैं। इस प्रकार के कार्य में कोई न्यूनतम मजदूरी का आंकड़ा नहीं होता है।

वर्तमान समय एक अत्यंत ही विडम्बनाओं से भरा हुआ समय है। कोरोना महामारी के चक्कर में एक अत्यंत ही वृहद् समस्या का जन्म हो गया है। इस समस्या के चलते विश्व भर की सरकारों ने पूर्ण रूप से कर्फ्यू (Curfew) लगा दिया है जिसका मतलब यह है कि कोई भी व्यक्ति घर के बाहर नहीं निकल सकता और ज्यादातर प्रतिष्ठान, उद्योग आदि बंद ही रहेंगे। अब हम जब मजदूरों की बात करें जो कि दिहाड़ी पर कमा कर खाते हैं और बचत के नाम पर वे कुछ नहीं कर पाते तो यह सवाल ज़रूर उठता है कि उनकी रोज़मर्रा की वस्तुओं का आदान प्रदान किस प्रकार से हो पायेगा। वर्तमान में एक गतिविधि बड़ी प्रचलित हुई है जिसको वर्क फ्रॉम होम (Work From Home) नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है बिना कार्यस्थल जाए अपने घर पर बैठे काम करना। लेकिन दिहाड़ी मजदूरी और स्वरोज़गार करने वाले व्यक्ति के लिए इन शब्दों से कोई सरोकार नहीं है क्यूंकि उनको कमाने के लिए बाहर निकलना ही पड़ेगा। रोज़मर्रा के मजदूर एक दिन की बीमारी के लिए भी तैयार नहीं हो पाते क्यूंकि यह सत्य है कि काम नहीं किया तो मतलब पैसा नहीं मिलेगा और पैसा नहीं मिला तो कोई भी ज़रूरत नहीं पूरी हो पाएगी। अब ऐसे में जब सरकारों द्वारा पूर्ण रूप से बंदी की बात की जाती है तो यह सोचना लाज़मी हो जाता है कि आखिर इन मजदूरों का क्या होगा।

कोरोना से घरों में रहकर अपना ख्याल कर के बचा जा सकता है लेकिन जो वास्तविकता में सबसे बड़ी बिमारी भूख है, उससे कैसे बचा जा सकता है? यह सवाल एक ऐसा सवाल है जो कि भारत भर के करोड़ों मजदूरों का सवाल है। अब ऐसे हालात से बचने के लिए सरकारों को राशन और हर उस चीज़ का ख्याल रखना चाहिए जो कि सबसे मूलभूत सुविधाएं हैं। यदि सरकार इन मजदूरों तक पहुँच नहीं पा रही है तो ऐसे में आर्थिक मदद किया जाना एक अत्यंत ही सुगम साधन है। दवाइयों आदि की उपलब्धता और समुचित इंतज़ाम, जल, भोजन आदि का इन लोगों तक पहुंचाना इस कठिन घड़ी में एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। साथ ही पूरी ज़िम्मेदारी सरकार की ही नहीं है। कुछ ज़िम्मेदारी हम आम नागरिकों की भी है जो इन मजदूरों को रोज़गार प्रदान करते हैं। यदि आपके घर में कोई बाई, नौकर, ड्राईवर (Driver) आदि आते हैं, तो इस मुश्किल घड़ी में उन्हें पगार सहित छुट्टी देना एक अच्छा विकल्प है। आपके लिए वे कुछ हज़ार रूपए ही हो सकते हैं लेकिन उन श्रमिकों के लिए वह एक बड़ी सहायता होगी। आखिरकार हम एक ज़िन्दगी को चंद रुपयों से तो नहीं माप सकते ना।

सन्दर्भ:
1.
https://qz.com/india/1819957/coronavirus-prevention-measures-dont-reach-indias-huge-informal-economy/
2.https://scroll.in/article/956385/coronavirus-they-cannot-work-from-home-or-follow-social-distancing-here-is-why



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