खगोलीय टकराव की घटना से पृथ्वी पर क्या प्रभाव पड़ता है?

जौनपुर

 15-02-2020 01:00 PM
विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

ब्रह्मांड में बहुत से उल्कापिंड, धूमकेतु और छोटे ग्रह मौजूद होते हैं, जो अंतरिक्ष में बेकाबू होकर घूमते रहते हैं और उनकी एक दूसरे से या किसी ग्रह से टकराने की संभावनाएं काफी अधिक होती हैं। खगोलीय वस्तुओं के बीच इस टकराव को टकराव घटना कहा जाता है। ये घटनाएं औसत दर्जे का प्रभाव पैदा करती हैं। ये टकराव की घटनाएं आमतौर पर क्षुद्रग्रह, धूमकेतु या उल्कापिंड की वजह से होती हैं, इनसे होने वाला प्रभाव काफी कम होता है।

टकराव की घटना में बड़े प्रभाव काफी दुर्लभ रूप से होते हैं। अंतरिक्ष से उल्कापिंड के हज़ारों छोटे टुकड़े, प्रत्येक वर्ष पृथ्वी की ज़मीन से टकराते हैं। कुछ अनुसंधन से यह भी पता चलता है कि प्रत्येक वर्ष पृथ्वी से लगभग 6,100 उल्काएं टकराती हैं। हालांकि, इन घटनाओं में से अधिकांश अप्रत्याशित हैं और किसी का ध्यान नहीं जाता है, क्योंकि वे निर्जन वन के विशाल दलदलों में या समुद्र के खुले पानी में गिरते हैं। टकराव क्रेटर (Impact Crater) और संरचना सौर मंडल की कई ठोस वस्तुओं का प्रमुख भू-भाग है और उनकी आवृत्ति और पैमाने के लिए सबसे मज़बूत अनुभवजन्य साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।

टकराव की घटनाओं ने अपने गठन के बाद से सौर मंडल के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके साथ ही प्रमुख टकराव की घटनाओं ने पृथ्वी के इतिहास को महत्वपूर्ण रूप से आकार दिया है जैसे, पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली का निर्माण, पृथ्वी पर पानी की उत्पत्ति और जीवन के बड़े विकासवादी इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पृथ्वी के इतिहास में सैकड़ों टकराव की घटनाएं देखी गई हैं, जिनके कारण कई मौतें, चोटें, संपत्ति की क्षति, या अन्य महत्वपूर्ण स्थानीयकृत परिणामों को देखा गया है। आधुनिक समय में सबसे प्रसिद्ध दर्ज की गई घटनाओं में से एक तुंगुस्का घटना (Tunguska Event) थी, जो कि 1908 में साइबेरिया (Siberia), रूस में हुई थी। वहीं 2013 में चेल्याबिंस्क उल्का (Chelyabinsk Meteor) घटना एकमात्र ऐसी घटना है जिसे आधुनिक समय में काफी हानि करने के रूप में पहचाना जाता है। चेल्याबिंस्क उल्का तुंगुस्का घटना के बाद से पृथ्वी से टकराने वाली सबसे बड़ी दर्ज की गई वस्तु है।

वैसे उल्कापिंड संबंधी टकराव क्रेटर हमारे ग्रह पर सबसे दिलचस्प भूवैज्ञानिक संरचनाओं की उत्पत्ति करते हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश क्रेटर प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा मिटा दिए जाते हैं, लेकिन इनमें से कई अभी भी एक परिपत्र भूवैज्ञानिक निशान के रूप में देखे जाते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा भारत में पृथ्वी की छाल में तीन गहरे निशान खोजे गए थे। उन निशानों के बारे में ऐसा कहा जाता है कि ये उल्कापिंड के अवशेषों को चिह्नित करते हैं। जिसका साक्ष्य हमें भारत में मौजूद “लोनार झील” से मिलता है, जो विश्व में सबसे बड़ा बेसाल्टिक (Basaltic) टकराव गड्ढा होने के लिए प्रसिद्ध है। अविश्वसनीय रूप से लोनार क्रेटर बेसाल्ट चट्टान में बना सबसे कम उम्र का और सबसे अच्छा संरक्षित प्रभाव गड्ढा है। इसे लगभग 50,000 साल पुराना माना जाता है और पृथ्वी पर इस तरह का ये एकमात्र क्रेटर है। एक भूमि-बंद जल निकाय जो एक ही समय में क्षारीय और खारा है, लोनार झील ऐसे सूक्ष्म जीवों का समर्थन करती है जो शायद ही कभी पृथ्वी पर पाए जाते हैं। हरे-भरे जंगल से घिरी यह झील चारों ओर मास्केलिनाइट (Maskelynite) जैसे खनिज पदार्थ के टुकड़ों और सदियों पुराने परित्यक्त मंदिर से घिरी हुई है।

हालांकि इन घटनाओं की भविष्यवाणी करना लगभग असंभव है, लेकिन कुछ ऐसे तरीके भी हैं जिनसे शोधकर्ता यह माप सकते हैं कि कितने उल्कापिंड पृथ्वी पर गिरे हैं। उदाहरण के लिए, निर्जन क्षेत्रों में जैसे सहारा रेगिस्तान या अंटार्कटिका (Antarctica) में ग्लेशियर (Glacier) के ऊपर, ज़मीन पर उल्कापिंड ढूंढना काफी आसान है। क्योंकि ये क्षेत्र काफी हद तक अस्तित्वहीन हैं, यहाँ जो उल्कापिंड हैं, वे वैज्ञानिकों को एक सामान्य विचार प्रदान करते हैं कि कितने अंतरिक्ष पत्थर कितने समय में पृथ्वी से टकराए होंगे।

संदर्भ:
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Impact_event
2. https://bit.ly/37qk4Cl
3. https://cosmosmagazine.com/space/earth-hit-by-17-meteors-a-day
4. https://bit.ly/2vBmvVk



RECENT POST

  • आज कपास की आसमान छूती कीमतें छोटी मिलों की स्थिरता, लाभ क्षमता के लिए नहीं अनुकूल
    स्पर्शः रचना व कपड़े

     28-05-2022 09:18 AM


  • परिवहन के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगी कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात AI
    य़ातायात और व्यायाम व व्यायामशाला

     27-05-2022 09:37 AM


  • खाद्य यादों में सभी पांच इंद्रियां शामिल होती हैं, इस स्मृति को बनाती समृद्ध
    स्वाद- खाद्य का इतिहास

     26-05-2022 08:17 AM


  • जौनपुर सहित यूपी के 6 जिलों से गुज़रती पवित्र सई नदी, क्यों कर रही अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष?
    नदियाँ

     25-05-2022 08:18 AM


  • जंगलों की मिटटी में मौजूद 500 मिलियन वर्ष पुरानी विस्तृत कवक जड़ प्रणालि, वुड वाइड वेब
    पेड़, झाड़ियाँ, बेल व लतायें

     24-05-2022 07:38 AM


  • चंदा मामा दूर के पे होने लगी खनिज संसाधनों के लिए देशों के बीच जोखिम भरी प्रतिस्पर्धा
    खनिज

     23-05-2022 08:47 AM


  • दुनिया का सबसे तेजी से उड़ने वाला बाज है पेरेग्रीन फाल्कन
    व्यवहारिक

     22-05-2022 03:53 PM


  • क्या गणित से डर का कारण अंक नहीं शब्द हैं?भाषा के ज्ञान का आभाव गणित की सुंदरता को धुंधलाता है
    विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

     21-05-2022 11:05 AM


  • भारतीय जैविक कृषि से प्रेरित, अमरीका में विकसित हुआ लुई ब्रोमफील्ड का मालाबार फार्म
    भूमि प्रकार (खेतिहर व बंजर)

     20-05-2022 09:57 AM


  • क्या शहरों की वृद्धि से देश के आर्थिक विकास में भी वृद्धि होती है?
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     19-05-2022 09:49 AM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.

    login_user_id