जौनपुर में भी दिखाई देता है काली गर्दन वाला सारस

जौनपुर

 14-01-2020 10:00 AM
पंछीयाँ

सुहाने मौसम और हल्की ठंड में खूबसूरत पक्षियों को देखना किसी सुखद अहसास से कम नहीं होता है। ऐसे ही जौनपुर में पाए जाने वाले काली गर्दन वाले सारस की फरवरी 2016 में भरतपुर, राजस्थान में एक काफी रोचक तस्वीर ली गई थी। जिसमें ये पक्षी कूट (Coot) पक्षी का शिकार करते हुए दिखाई देता है। जब यह कूट दलदल से घास खा रहा था, तभी काली गर्दन वाला यह सारस तेज़ी से उड़ते हुए आया और उसे चोंच में दबा लिया।

ऊपर दिया गया चित्र एन. केशवमूर्ति द्वारा भरतपुर, राजस्थान में लिया गया है जो कि बेंगलुरु में स्थित एक फोटोग्राफी शिक्षक और प्रकृतिवादी हैं।

काले गर्दन वाले सारस मांसाहारी पक्षी होते हैं जो न केवल मछली का शिकार करते हैं, बल्कि अन्य प्राणियों की भी विस्तृत विविधता का शिकार करते हैं। पानी वाले पक्षियों जैसे कि कूट और बत्तख के अलावा, वे केकड़े, मेंढक, कछुए के बच्चों, मोलस्क (Mollusks) और कीड़े का भी शिकार करते हैं। यह भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया की निवासी प्रजाति है जिसकी ऑस्ट्रेलिया में आबादी कम है। यह दलदली भूमि, चावल और गेहूं जैसी कुछ फसलों के स्थान में पाए जाते हैं, जहां इन्हें काफी उच्च मात्रा में शिकार मिलता है। ऑस्ट्रेलिया में, इसे कभी-कभी जाबिरू (Jabiru) भी कहा जाता है, हालांकि यह नाम अमेरिका में पाए जाने वाले सारस प्रजाति को संदर्भित करता है। यह उन कुछ सारस में से एक है जो भोजन करते समय दृढ़ता से क्षेत्रीय होते हैं।

इन पक्षियों के दोनों लिंगों के वयस्क पक्षियों में भारी चोंच मौजूद होती है और वे सफेद और चमकदार काले रंग की होती हैं। इनमें भिन्नता इनकी आँखों की पुतली के रंग से की जाती है। इनकी वयस्क मादा में पीले रंग की आँखों की पुतली होती है जबकि वयस्क नर की भूरी होती है। इस पक्षी की लंबाई 129–150 सेमी होती है, जिसमें 230 सेंटीमीटर लंबा इनका पंख होता है। वहीं इस प्रजाति का प्रकाशित वज़न लगभग 4,100 ग्राम बताया गया है।

वहीं भारत में, यह प्रजाति पश्चिम, मध्य उच्चभूमि और उत्तरी गंगा के मैदानों से पूर्व में असम घाटी तक फैली हुई है, लेकिन ये प्रायद्वीपीय भारत और श्रीलंका में काफी दुर्लभ पाए जाते हैं। दक्षिणी और पूर्वी पाकिस्तान में यह सामयिक रूप से दिखाई देते हैं और मध्य तराई नेपाल में एक प्रजनन प्रजाति है। यह न्यू गिनी (New Guinea) के माध्यम से दक्षिण पूर्व एशिया तक फैले हुए हैं और ऑस्ट्रेलिया (Australia) के उत्तरी आधे भाग में भी मौजूद हैं। इस प्रजाति की सबसे अधिक आबादी ऑस्ट्रेलिया में पाई जाती है, जहां ये एशबर्टन नदी (Ashburton River), ओस्लो, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया से लेकर उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उत्तर-पूर्व न्यू साउथ वेल्स (New South Wales) तक पाए जाते हैं।

ये पक्षी भारत में घोंसले का निर्माण मानसून के चरम के दौरान शुरू करते हैं, जिसमें अधिकांश घोंसले सितंबर-नवंबर के दौरान शुरू होते हैं। वे बड़े पेड़ों या कभी-कभी बड़े दलदल में एक मंच का निर्माण करके घोंसला बनाते हैं। कृषि परिदृश्य में, मानव हस्तक्षेप के चलते वयस्क घोंसला छोड़ने पर विवश हो जाते हैं, लेकिन अन्य स्थानों पर ये सफलतापूर्वक घोंसला बनाते हैं। साथ ही इनका घोंसला 3 से 6 फीट तक बड़ा होता है, जो लकड़ियों, शाखाओं और पत्तों से बना होता है। ये सारस एक बारी में चार अंडे देते हैं, जो रंग में हल्के सफेद और आकार में चौड़े अंडाकार होते हैं।

वहीं ये प्रजाति काफी व्यापक रूप से बिखरी हुई है और उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों में पाई जाती है, जिससे इनकी आबादी का अनुमान लगा पाना मुश्किल होता है। श्रीलंका में इनकी आबादी लगभग 50 मानी गई है, जबकि ये प्रजाति थाईलैंड, म्यांमार, लाओस और कंबोडिया में बहुत दुर्लभ हो गई हैं। सूंडेइक (Sundaic) क्षेत्र में इनके विलुप्त होने का अनुमान लगाया गया है। संयुक्त दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में ये 1000 से कम रह गए हैं। 2011 के एक अध्ययन में दक्षिण-पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इनकी जनसंख्या स्थिर पाई गई, हालांकि जनसंख्या वृद्धि दर में सूखे वर्षों या भूमि उपयोग में बदलाव के कारण गिरावट को देखा गया है।

ऑस्ट्रेलिया में इनकी आबादी का अनुमान लगभग 20,000 पक्षी तक लगाया गया है जबकि एक अधिक सटीक अनुमान लगभग 10,000 पक्षियों की गणना को दर्शाता है। इनकी संख्या में गिरावट का कारण इनके निवास स्थान की क्षति, उथले दलदल का सूखना, घोंसले में गड़बड़ी, अतिवृष्टि, प्रदूषण, बिजली के तारों के साथ टकराव और शिकार होना है। इसको अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ द्वारा खतरे में आने वाले पक्षी के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

भारत के बिहार में इनका शिकार करने की एक परंपरा मौजूद थी, जिसे “मीर शिकार” के नाम से जाना जाता था। इसमें एक युवा को शादी से पहले काली गर्दन वाले इस सारस को जीवित पकड़ना होता था, जिसके लिए वे युवा और होने वाली दुल्हन एक छड़ी की मदद से इस पक्षी को पकड़ते हैं। इस प्रक्रिया में एक युवक के मारे जाने के बाद 1920 में इस अनुष्ठान को बंद कर दिया गया था। ऐसा माना जाता है कि असम में इनके बच्चों को मांस के लिए घोंसले में ही पकड़ लिया जाता है।

संदर्भ:
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Black-necked_stork
2. https://www.conservationindia.org/gallery/black-necked-stork-preying-on-a-coot-bharatpur-rajasthan

चित्र सन्दर्भ:-
1. https://pixabay.com/no/photos/bird-stork-black-necked-stork-2196415/
2. https://picryl.com/media/ksc-99pp0303-a3cd25
3. https://bit.ly/2QQ0Gtj
4. https://bit.ly/2smx25D



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