कौन से मानदंड बनाते हैं जल को पीने और खेती के लिए उपयोगी?

जौनपुर

 14-12-2019 09:21 AM
नदियाँ

जिस प्रकार से विभिन्न वस्तुओं को उनकी उपयोगिताओं के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है, ठीक उसी प्रकार से पानी को भी उसकी उपयोगिता और गुणवत्ता के आधार पर वर्ग़ीकृत किया जाता है। किसी भी पानी की गुणवत्ता को मापने हेतु पीएच (pH), टीडीएस (TDS), टीएसएस (TSS), डीओ (DO) और जल कठोरता (Hardness) आदि मानदंडों का उपयोग किया जाता है। तो चलिए जानते हैं कि आखिर पानी की गुणवत्ता को जांचने के लिए उपयोग किये जाने वाले ये विभिन्न मानदंड हैं क्या?
पीएच (pH) : किसी भी जल का pH उसमें उपस्थित हाइड्रोजन आयन (Hydrogen Ion) की सांद्रता है। यह विशेष रूप से जल की अम्लता और क्षारीयता की माप के लिए उपयोग किया जाता है।
टीडीएस (TDS – Total Dissolved Solids) : पानी को सार्वभौमिक विलायक कहा जाता है क्योंकि इसमें विभिन्न खनिज लवण, आयन, अकार्बनिक लवण इत्यादि घुले रहते हैं। पानी में घुले कुल ठोस पदार्थ की मात्रा को ही टीडीएस कहा जाता है। इसे मिलीग्राम/लीटर पीपीएम (mg/L ppm) के रूप में व्यक्त किया जाता है।
टीएसएस (TSS - Total suspended solids of water) : किसी भी जल का TSS उसमें निलंबित ठोस पदार्थों की कुल मात्रा है। यह पानी में पाये जाने वाले ऐसे कण हैं जो 2 माइक्रोन से बड़े होते हैं।
डीओ (DO - Dissolved oxygen) : जल का DO ऑक्सीजन की वह कुल मात्रा है जो पानी में घुली हुई होती है।

उपरोक्त सभी मानदंडों का उपयोग पानी की गुणवत्ता को जांचने के लिए किया जाता है। इन्हीं मानदंडों के आधार पर गोमती नदी जोकि जौनपुर शहर के निकट स्थित है, के पानी की भी जांच की गयी है। नदी के कुछ हिस्सों पर डीओ, टीडीएस, टीएसएस, नाइट्रेट (Nitrate), नाइट्राइट (Nitrite) और अन्य चीज़ों की मात्रा उपयुक्त सीमा से बाहर थी। अर्थात कुछ हिस्सों में पानी बहुत अधिक प्रदूषित था और पारंपरिक उपचार के बिना उपयोग में नहीं लाया जा सकता था। कई नालों के माध्यम से घरेलू, नगरपालिका और औद्योगिक कचरे का निर्वहन नदी में होता है जिससे यह अत्यधिक प्रदूषित हो गयी है।

क्लोराइड (Chloride), नाइट्रेट और जल की कुल कठोरता में भी वृद्धि हुई है जिसका मुख्य कारण घरेलू और नगरपालिका अपशिष्ट निर्वहन हैं। इन सभी अपशिष्टों के कारण नदी में भारी धातुओं की सांद्रता बहुत अधिक बढ़ गयी है। भारी धातुएं मनुष्य में कैंसर (Cancer) की सम्भावना को बढ़ा देती हैं। कठोर जल अधिकतम स्तर जोगियापुर घाट (249.5 mg/l) जबकि न्यूनतम स्तर गोकुल घाट (166 mg/l) पर पाया गया है अर्थात नदी के सभी हिस्सों में जल कठोरता अनुमेय सीमा के भीतर है क्योंकि कुल कठोरता के लिए अधिकतम वांछनीय सीमा 300 mg/l होती है। इसी प्रकार पीने के पानी के लिए नाइट्राइट की अधिकतम वांछनीय सीमा 0.50 मिलीग्राम/लीटर होती है। नाइट्राइट की अधिकतम सांद्रता जोगियापुर घाट (0.569 mg / l) तथा न्यूनतम सांद्रता राम घाट (0.129 mg / l) पर पायी गयी है।

जौनपुर जिले में पीने के साथ-साथ सिंचाई के लिए प्रमुख स्रोत के रूप में सतही जल का उपयोग किया जाता है। पिछले दशकों में कई गुना जनसंख्या, शहरीकरण, भूमि उपयोग परिवर्तन और विकास गतिविधियों में वृद्धि होने से इस क्षेत्र के जल संसाधन का अत्यधिक दोहन और प्रदूषण किया गया। सतही जल की गुणवत्ता का आंकलन करने पर रासायनिक विश्लेषण से प्राप्त परिणामों के अनुसार सतही जल का टीडीएस, पीएच, क्षारीयता, कुल कठोरता, डीओ, कैल्सियम (Calcium) और मैग्नीशियम (Magnesium) आदि अनुमेय सीमा के भीतर हैं जबकि विद्युत चालकता, टीडीएस आदि वांछनीय सीमा से ऊपर पाये गये हैं। इसलिए सतही जल का उपयोग सिंचाई के उद्देश्य से किया जा सकता है और शुद्धिकरण के बाद पीने के लिए भी उपयोग में लाया जा सकता। इसी प्रकार से भू-जल की गुणवत्ता की जांच के लिए जौनपुर शहर के 21 ब्लॉकों के भू-जल का अध्ययन करने पर पाया गया कि भू-जल का पीएच 7.5-8.9 है जोकि इसकी क्षारीय प्रकृति को दर्शाता है। जल की विद्युत चालकता 484 और 3120 (µs/cm-1) के बीच है। भू-जल में घुले कुल ठोस पदार्थों की मात्रा (TDS) 443 से 2434 (mg /l) के बीच पायी गयी। लवणों, सोडियम अवशोषण अनुपात (SAR), अवशिष्ट सोडियम कार्बोनेट (RSC) आदि की अत्यधिक मात्रा के कारण भू-जल को पीने और सिंचाई के उद्देश्य से अयोग्य पाया गया है।

गोमती नदी के प्रदूषण को दूर करने के लिए कई रणनीतियां अपनायी जा सकती हैं जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:
गंगा के उद्गम स्थल से लेकर संगम स्थल तक संपूर्ण बाढ़ के मैदान का सीमांकन करना चाहिए।
बाढ़-मैदान में अवैध अतिक्रमणों को हटाया जाना चाहिए। नदी के बहाव क्षेत्र से 500 मीटर की दूरी पर कोई क्षेत्र निर्माण कार्य नहीं होना चाहिए। इस क्षेत्र का उपयोग केवल रोपण के लिए किया जाना चाहिए।
उद्भव के साथ-साथ सभी 24 प्रमुख सहायक नदियों के संगम स्थल को " ईको फ्रेजाईल” (Eco Fragile) क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिए।
नदी के किनारे पर अगले दस वर्षों के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चालाया जाना चाहिए। नदी के किनारे पर्याप्त मात्रा में भूमि उपलब्ध है जिसका उपयोग वन के लिए किया जा सकता है।

संदर्भ:
1.
https://bit.ly/35jQdvc
2. https://bit.ly/2RLKla9
3. https://bit.ly/2EbqHwl
4. https://bit.ly/34h3KCk
5. https://bit.ly/38wvAhv



RECENT POST

  • छोटा लाल फल, जिसने बदल दिया भारतीय रसोई का स्वाद
    स्वाद- खाद्य का इतिहास

     25-09-2020 03:32 AM


  • महारानी जिन्दन की दिलचस्प कहानी
    उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

     24-09-2020 03:20 AM


  • भारत में दास के रूप में पहुंचे और शासकों के रूप में उभरे अफ्रीकियों की कहानी भुला दी गई
    सिद्धान्त 2 व्यक्ति की पहचान

     23-09-2020 03:33 AM


  • इस्लामिक वास्तुकला के विशिष्ट उदाहरणों में से एक है, जौनपुर की खालिस मुखलिस मस्जिद
    वास्तुकला 1 वाह्य भवन

     22-09-2020 10:51 AM


  • भारतीय शिल्प निर्माण का अनूठा उत्पाद हैं, काली मिट्टी के बर्तन
    म्रिदभाण्ड से काँच व आभूषण

     21-09-2020 04:16 AM


  • ऐतिहासिक एलिफेंटा गुफाएं
    खदान

     20-09-2020 08:23 AM


  • व्यक्ति के बारे में कई जानकारियां हासिल कर पाने में सक्षम है, डीएनए परीक्षण (DNA Test)
    डीएनए

     19-09-2020 01:10 AM


  • बैटरियों का बैंक क्या है? क्या यहां वास्‍तव में बैटरियां मिलती है?
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     18-09-2020 02:29 AM


  • प्राचीन युद्धों के मुख्य किरदार और चतुरंग सेना के मुख्य खंड: हाथी
    हथियार व खिलौने

     17-09-2020 06:07 AM


  • खयाल गायकी
    ध्वनि 1- स्पन्दन से ध्वनि

     16-09-2020 02:18 AM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.

    login_user_id