महर्षि वाल्मीकि से जुड़े रोचक तथ्य

जौनपुर

 13-10-2019 10:00 AM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

आज यानी 12 अक्टूबर को महर्षि वाल्मीकि जयंती है। महर्षि वाल्मीकि आदिकवि के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्होने संस्कृत में रामायण की रचना की। उनके द्वारा रची रामायण वाल्मीकि रामायण कहलाई। रामायण एक महाकाव्य है जो कि राम के जीवन के माध्यम से हमें जीवन के सत्य और कर्तव्य से परिचित करवाता है। आदिकवि शब्द 'आदि' और 'कवि' के मेल से बना है। 'आदि' का अर्थ होता है 'प्रथम' और 'कवि' का अर्थ होता है 'काव्य का रचयिता'। वाल्मीकि ने संस्कृत के रामायण नामक प्रथम महाकाव्य की रचना की थी। प्रथम संस्कृत महाकाव्य की रचना करने के कारण वाल्मीकि आदिकवि कहलाये। ये भृगु कुल में उत्पन्न ब्राह्मण थे जिसका प्रमाण उन्होंने स्वयं स्वलिखित रामायण में दिया है।
1. 'रामायण' में भगवान राम और देवी सीता की कहानी है। यह उल्लेखनीय तथ्य है कि भगवान श्री राम ने स्वयं रामायण की कहानी का रसास्वादन किया था जिसके पश्चात वह अत्यंत प्रसन्न हुए थे। राम के सामने लव और कुश ने बहुत मधुर तरीके से कथा का गान किया। हालांकि श्रीराम को यह नही पता था, कि जो दो बालक उनके सम्मुख उन्ही की कथा का गान कर रहे थे वे कोई और नही स्वयं उन्ही के पुत्र थे। कवि, जिन्होंने 'रामायण' की रचना की तथा लव और कुश को गीत और कहानी सिखाई, वह कोई और नही, महर्षि वाल्मीकि ही थे।
2. वाल्मीकि की रामायण संस्कृत भाषा में लिखित है। यह एक बहुत सुंदर और लंबी कविता है, जो एक महानायक की कहानी कहती है, इसीलिए इसे महाकाव्य की संज्ञा दी गयी है।
3. वाल्मीकि की 'रामायण' संस्कृत में पहली कविता है। इसलिए, इसे 'आदिकाव्य' या पहली कविता भी कहा जाता है। वाल्मीकि को 'आदिकवि' के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है पहला कवि।
4. वाल्मीकि वह नाम नहीं था जिसे उनके माता-पिता ने चुना था। उनका असली नाम रत्नाकर था। संस्कृत में 'वाल्मिका' शब्द का अर्थ है बांबी। चूंकि वह एक बांबी से निकले थे, इसलिए उन्हें वाल्मीकि नाम मिला।

सतयुग, त्रेता और द्वापर तीनों कालों में वाल्मीकि का उल्लेख मिलता है वो भी वाल्मीकि नाम से ही। रामचरित्र मानस के अनुसार जब राम वाल्मीकि आश्रम आए थे तो वो आदिकवि वाल्मीकि के चरणों में दण्डवत प्रणाम करने के लिए जमीन पर लेट गए थे और उनके मुख से निकला था "तुम त्रिकालदर्शी मुनिनाथा, विश्व बद्रर जिमि तुमरे हाथा।" अर्थात आप तीनों लोकों को जानने वाले स्वयं प्रभु हो। ये संसार आपके हाथ में एक बेर के समान प्रतीत होता है।
महाभारत काल में भी वाल्मीकि का वर्णन मिलता है। जब पांडव कौरवों से युद्ध जीत जाते हैं तो द्रौपदी यज्ञ रखती है, जिसके सफल होने के लिये शंख का बजना जरूरी था और कृष्ण सहित सभी द्वारा प्रयास करने पर भी पर यज्ञ सफल नहीं होता तो कृष्ण के कहने पर सभी वाल्मीकि से प्रार्थना करते हैं। जब वाल्मीकि वहां प्रकट होते हैं तो शंख खुद बज उठता है और द्रौपदी का यज्ञ सम्पूर्ण हो जाता है। इस घटना को कबीर ने भी स्पष्ट किया है "सुपच रूप धार सतगुरु आए। पांडों के यज्ञ में शंख बजाए।"

सन्दर्भ:-
1.
https://bit.ly/2OGep5o
2. https://bit.ly/2VIR5Wp



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