विभिन्न समुदायों द्वारा विभिन्न कारणों से गुदवाए जाते थे टैटू

जौनपुर

 04-10-2019 10:24 AM
सिद्धान्त 2 व्यक्ति की पहचान

विश्व में टैटू (Tattoo) का इतिहास काफी पुराना है और अब ‍तक यह जारी है। इसमें बस अंतर है तो इतना कि पहले शरीर पर टैटू गुदवाना 'प्रथा' हुआ करती थी और अब युवाओं के द्वारा पसंद किए जाने के कारण यह एक 'फैशन' (Fashion) बन गया है। टैटू को प्राचीन काल से ही भारत में आभूषणों की तरह उपयोग किया जाता आ रहा है। लेकिन वास्तव में यह रिवाज़ कितना पुराना है इसका किसी को ज्ञान नहीं है। उत्तर-पूर्व के घने, बारिश से लथपथ पहाड़ी जंगलों से लेकर सुदूर पश्चिम में कच्छ के सूखे रेगिस्तान तक, टैटू को सदैव मानव शरीर को सुशोभित करने के लिए नहीं बल्कि उनका उपयोग देश भर में विभिन्न समुदायों द्वारा विभिन्न कारणों से किया गया है। तो चलिए जानते हैं उन भारतीय जनजातियों के बारे में जिन्होंने कई लोकप्रिय हस्तियों से पहले टैटू को कुछ प्रथाओं के चलते गुदवाया था।

अरुणाचल प्रदेश की अपटानी जनजाति - अपटानी महिलाओं को पड़ोसी आदिवासियों द्वारा अगवा करने से बचाने के लिए, इस जनजाति की महिलाओं के चेहरों को गोदने की प्रक्रिया के माध्यम से अनाकर्षक बना दिया जाता था। यह गोदने की प्रक्रिया बहुत दर्दनाक होती थी क्योंकि इसमें वे त्वचा को कांटों का इस्तेमाल करके काटते थे और उसके बाद उस घाव में जानवरों की चर्बी में मिश्रित कालिख को गहरा नीला रंग पाने के लिए डालते थे।

कई आदिवासी लोगों द्वारा इसको परंपरा माने जाने के बावजूद भी इस अमानवीय प्रथा को भारत सरकार ने 1970 के दशक में प्रतिबंधित कर दिया था। हालाँकि, अपटानी जनजाति की कुछ बुज़ुर्ग महिलाओं के चहरे पर अभी भी ऐसे निशान देखे जा सकते हैं।

सिंगपो जनजाति - असम और अरुणाचल दोनों में पाई जाने वाली सिंगपो जनजाति में विवाहित महिलाओं के दोनों पैरों (टखने से घुटने तक) को गोदने की परंपरा मौजूद है। वहीं इस जनजाति में पुरुषों के भी शरीर के अंगों पर गोदने की परंपरा पाई जाती है। लेकिन सिंगपो जनजाति की अविवाहित लड़कियों पर टैटू गोदने की प्रक्रिया की मनाही है।

दक्षिण भारत - दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में टैटू को ‘पचकुठारथु’ कहा जाता है। टैटू की परंपरा दक्षिण भारत में, विशेष रूप से तमिलनाडु में, 1980 से भी पहले से लोकप्रिय रही है। इस क्षेत्र में, ज्यादातर कोरथी टैटू कलाकार नए ग्राहकों की तलाश के लिए देश भर में यात्रा करते थे। कोल्लम, एक लहरदार जटिल टैटू का डिज़ाइन पहले काफी लोकप्रिय हुआ करता था क्योंकि उस समय ऐसा माना जाता था कि यह दुष्ट प्राणियों को भगाता है। यह स्थिर रूप से मृत्यु तक लोगों को सुरक्षित रखने के लिए शरीर पर चिह्नित किया जाता था।

मध्य भारत – गोदने की परंपरा मध्य भारत में भी मौजूद थी। बिहार की धनुक जनजाति में महिलाओं को दुश्मनों की नज़र से बचाने के लिए उन्हें अनाकर्षक बनाने की प्रथा थी। इसके अलावा, निम्न वर्ग की महिलाओं को अभी भी परदे के चलन की वजह से अपने शरीर के भागों को टैटू के साथ ढकना पड़ता है ताकि वे दूसरों को अपने निम्न वर्ग का संकेत दे सकें। झारखंड में मुंडा जनजाति, जो साहस का विशेष रूप से सम्मान करती है, कुछ ऐतिहासिक घटनाओं को याद रखने के लिए टैटू बनवाती हैं। इन्होंने मुगलों को हराया था, इसलिए उनकी जीत की याद में मुंडा पुरुषों द्वार अपने माथे पर तीन सीधी खड़ी रेखाओं को गुदवाया जाता है।

पश्चिमी जनजाति - भारत की पश्चिमी जनजातियों द्वारा भक्ति के धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक विषयों के निकट संबंध के प्रतीक के रूप में टैटू गुदवाया जाता था। कच्छ की रबारी महिलाएं सजावटी, धार्मिक और चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए टैटू गुदवाती थीं। वे त्वचा पर स्थायी रूप से टैटू बनाने के लिए एक सुई और तरल रंगद्रव्य का इस्तेमाल करते थे और सूजन को रोकने के लिए, वे टैटू वाली त्वचा पर हल्दी का लेप लगाते थे।

आधुनिक समय में लोगों द्वारा काफी हद तक इन प्रथाओं को त्याग दिया गया है। वर्तमान समय में टैटू को महज़ सौन्दर्य और फैशन के लिए गुदवाया जाता है। अब टैटू व्यक्ति की पहचान और क्षेत्र के बारे में जानकारी का प्रतीक नहीं बल्कि यह विश्वासों, यादों और जीवन के दौर आदि को दर्शाने का एक तरीका बन गया है।

संदर्भ:
1.
https://www.thebetterindia.com/58170/india-tattoo-tradition-history/
2. https://bit.ly/2VhskAb
3. https://bit.ly/2oBBubG
4. https://bit.ly/31Kfihb
5. https://vocal.media/wander/body-tattoos-versus-indian-beliefs-1
चित्र सन्दर्भ:-
1.
https://www.flickr.com/photos/10420647@N07/4153704284/
2. https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Singpho_Dress..jpg



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