जौनपुर में भी हुआ था सत्ता के लिए लोदी राजवंश में संघर्ष

जौनपुर

 14-09-2019 10:00 AM
मध्यकाल 1450 ईस्वी से 1780 ईस्वी तक

भारत में कई राजवंशों ने समय-समय पर शासन किया जिसमें से लोदी वंश भी एक था। इस वंश की करीब तीन पीढ़ियों ने भारत पर राज किया जिसका पहला शासक बहलोल लोदी, दूसरा शासक सिकंदर लोदी तथा तीसरा शासक इब्राहिम लोदी था। इस वंश में सत्ता के लिए संघर्ष कई वर्षों तक चलता रहा जिसने जौनपुर शहर पर भी अपना आधिपत्य स्थापित किया। जौनपुर शहर प्राचीन मुस्लिम सल्तनत की राजधानी हुआ करता था जो 1397-1476 के बीच शर्की वंश के तहत फला-फूला। इसके बाद लोदी वंश के प्रथम शासक बहलोल लोदी ने जौनपुर के शर्की शासक हुसैनशाह शर्की को युद्ध में पराजित कर अपने बड़े बेटे बरबक शाह को जौनपुर का शासक नियुक्त किया।

बहलोल लोदी की मृत्यु के बाद 1489 में उसके छोटे बेटे सिकंदर लोदी को लोदी वंश का दूसरा शासक नियुक्त किया गया। जिसे तीनों शासकों में से सबसे कुशल शासक माना जाता है। उसके शासक बनते ही दिल्ली सल्तनत में बहुत अधिक परिवर्तन किये गए। लोदी क्षेत्र का विस्तार ग्वालियर और बिहार क्षेत्रों में करते हुए सिकंदर लोदी ने 1503 में आगरा शहर की भी स्थापना की। अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए उसने जौनपुर के शासक और अपने बड़े भाई बरबक शाह को 15वीं शताब्दी के अंत में पराजित किया और जौनपुर को अपने कब्ज़े में ले लिया। उसने धौलपुर, बीदर, चन्देरी तथा आस-पास के अन्य राज्यों पर भी विजय प्राप्त की और अपने साम्राज्य को पंजाब से लेकर बंगाल की सीमाओं तक फैलाया।

अपनी और अपने साम्राज्य की स्थिति को मज़बूत करने के लिए उसने महत्वपूर्ण कदम उठाये। शासक बनते ही साम्राज्य पर उसके निम्नलिखित प्रभाव देखने को मिले:
• सिंहासन पर बैठते ही उसने अपने दरबार के अधिकारियों को उसके प्रति औपचारिक सम्मान दिखाने के लिए मजबूर किया।
• अधिकारियों को उनकी आय का लेखा-जोखा भी प्रस्तुत करने को कहा गया।
• राज्यपालों को आदेश दिया गया कि वे अपनी राजधानी से छह मील आगे सुल्तान के आदेशों या फरमानों को प्राप्त करेंगे।
• उसने हर प्रशासनिक कार्य की देखरेख के लिए सुबह से रात तक कड़ी मेहनत की।
• न्यायिक प्रणाली में कई सुधार लाए गए।
• लोगों के आर्थिक कल्याण के लिए उसने बाज़ार में मूल्य नियंत्रण की एक अनौपचारिक प्रणाली प्रबल की।
• कृषि को बढ़ावा देने के लिए अनाज शुल्क समाप्त किया और किसानों को कृषि के लिए प्रोत्साहित किया गया।
• व्यापार की प्रगति हेतु सुल्तान ने सभी आंतरिक व्यापार कर्तव्यों को समाप्त किया।
• फारसी का अच्छा जानकार होने के नाते उसने इस भाषा में कविताओं की रचना की।
• शिक्षा के प्रसार और सुधार के लिए दो प्रसिद्ध विदेशी दार्शनिकों को राज्य में आमंत्रित किया गया।
• राज्य के खर्च पर प्रत्येक मस्जिद में एक धार्मिक उपदेशक, एक शिक्षक और एक मेहतर की नियुक्ति की गयी।
• वास्तुकला को बढ़ावा देने के लिए सुल्तान ने आगरा शहर का निर्माण किया जो मुगलों का एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और सांस्कृतिक केंद्र बना। उन्होंने कई मस्जिदों का निर्माण किया और दिल्ली में अपने पिता बहलोल लोदी की कब्र भी बनवाई।

21 नवम्बर 1517 को सिकंदर लोदी की मृत्यु के बाद उसके पुत्र इब्राहिम लोदी को लोदी राजवंश का तीसरा शासक बनाया गया जिसने एक दशक के भीतर ही लोदी साम्राज्य को पतन की ओर अग्रसर किया। उसकी नीतियों ने अफगान रईसों में असंतोष पैदा किया और इनकी इम्ब्राहिम लोदी द्वारा निर्मम हत्या भी की गयी। प्रशासनिक प्रणालियों की विफलता और व्यापार मार्गों को अवरुद्ध करने से साम्राज्य की अर्थव्यवस्था का पतन शुरू होना प्रारम्भ हुआ। खराब आर्थिक स्थिति, तैमूर के निरंतर युद्धों और जनता में फैले विद्रोह के कारण राजवंश बहुत कमज़ोर होने लगा। इब्राहिम लोदी के कठोर शासन ने उसके कई गुप्त प्रतिद्वंद्वियों को पैदा किया जिनमें से एक उनका मुख्य चाचा भी था जिसे लाहौर के राज्यपाल के रूप में भी जाना जाता था। उसने इब्राहिम को धोखा दिया तथा इब्राहिम द्वारा अपने अपमान का बदला लेने के लिए बाबर को आमंत्रित किया ताकि वह लोदी राज्य पर आक्रमण करे। इस प्रकार बाबर ने 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहिम को हराया और 75 वर्षों के लोदी शासन का अंत किया।

सन्दर्भ:
1.
http://www.bl.uk/onlinegallery/onlineex/apac/other/019wdz000000363u00000000.html
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Sikandar_Lodi
3. https://bit.ly/2kwcWlH
4. https://en.wikipedia.org/wiki/Rukunuddin_Barbak_Shah 5. https://bit.ly/2kIto24



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