जाने सल्तनत काल में किस प्रकार संगठित की जाती थी जौनपुर सरकार

जौनपुर

 16-04-2019 04:08 PM
मघ्यकाल के पहले : 1000 ईस्वी से 1450 ईस्वी तक

आज जौनपुर भले ही उत्तर प्रदेश राज्य का एक छोटा सा शहर हो परन्तु प्राचीन काल में 1394 ईस्वी से 1479 ईस्वी तक जौनपुर एक स्वतंत्र राज्य था जिसे शर्की सुल्तानों द्वारा शासित किया जाता था। इस शर्की साम्राज्य की स्थापना 1394 में मलिक सरवर द्वारा की गयी थी। मलिक सरवरद्वारा जौनपुर को एक स्वतंत्र साम्राज्य घोषित करने के कुछ ही वर्ष पश्चात जौनपुर पूरे विश्व भर में अपना वर्चस्व बनाने में कामयाब हो गया था।

जौनपुर सल्तनत शार्की सुल्तानों के शासनकाल में अपने शिखर पर था और इसकी एक वजह उनकी संगठित प्रशासन भी थी। जिस प्रकार उनकी सरकार आयोजित थी वह उनके साम्राज्य को और भी मजबूत बनाती थी। यह ईरानी प्रशासन के व्यवस्था से प्रभावित था और भारतीय परंपराओं के स्थिति के बिलकुल अनुकूल था।

जौनपुर सल्तनत के अधीन उनका प्रशासन कुछ इस प्रकार था:
केन्द्रीय शासन:

सुलतान: केन्द्रीय शासन में सबसे प्रमुख भूमिका सुलतान की थी। वह पूरे राज्य के कानूनी प्रमुख थें और सर्वोच्च न्यायालय के रूप में भी कार्य करते थें। राज्य की सभी महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा सुलतान के दरबार, मजलिस-ए-खलवत या मजलिस-ए-आम में कुछ उच्चतम अधिकारियों के उपस्थिति में ही होती थी। वह सेना दल के प्रमुख थें और सभी उच्च नागरिक और सैन्य पदों पर नियुक्तियां करते थे। राज्य की प्रत्येक शाखा और विभागों को प्रशासित करना भी सुल्तान के ही अंतर्गत आता था। सुलतान के कमजोर या नाबालिग होने पर एक उप-सुल्तान की न्युक्ति की जाती थी जिसे मलिक नाइब कहते थें।

ऊपर दिये गये चित्र में सुल्तान के अंतर्गत आने वाले चार शाही दीवानों के पदनाम को प्रदर्शित किया गया है, और सुल्तान के चित्र में मोहम्मद बिन तुगलक हैं।

सुल्तान मंत्रियों और अधिकारियों के एक समूह के माध्यम से शासन करते थें। केंद्र सरकार के मुख्य स्तंभ मंत्री या शाही दीवान थे। राज्य के चार स्तंभ दीवानी-ए-विज़ारत, दीवान-ए-अर्ज़, दीवान-ए-इंशा और दीवान-ए-रिसालत थे जिनकी राज्य में एक विशेष भूमिका थी।
1. दीवान-ए-विज़ारत: वज़ीर के अध्यक्षता में यह राज्य के वित्त विभाग की देख रेख करते थें और नाइब वज़ीर उपाध्यक्ष के रूप में वज़ीर के नीचे काम करते थें। इस वित्त विभाग को संभालने के लिए वज़ीर की सहायता अन्य कई कर्मचारी करते थें जैसे मुश्रिफ़-ए-ममालिक, जो खाते का लेखा-जोखा करते थें और मुस्तफ़-ए-ममालिक, जो लेखा परीक्षक के रूप में सभी हिसाब-किताब की जांच करते थें।
2. दीवान-ए-अर्ज़: यह रक्षा मंत्रालय था जो अरिज-ए-ममालिक द्वारा निर्देशित था इनका काम सेना का समीक्षण करना था। यह विभाग शाही सेना के संगठन और उनके रखरखाव के लिए जिम्मेदार था।
3. दीवान-ए-इंशा: यह विभाग शाही दरबार के पत्राचार और अभिलेख के देख रेख के लिए ज़िम्मेदार था। इस विभाग को एक केंद्रीय मंत्री के पद के अधीन रखा गया था, जिसे दबीर-ए-मामालिक, दबीर-ए-खास या अमीर-मुंशी के रूप में जाना जाता था। यह सुल्तान के निजी सचिव के रूप में भी काम करते थें और इन्हें अन्य मुंशियों की सहायता प्राप्त थी।
4. दीवान-ए-रिसालत: ग़ुलाम वंश के समय सारे सामाजिक कार्य की ज़िम्मेदारी सदर-उस-सुदूर की थी। यह सुलतान के रसूल (दूत) के रूप में जनता के शिकायतें सुन उनका निवारण करते थें।

प्रांतीय सरकार:
जौनपुर की प्रांतीय सरकार पूर्ण रूप से विकसित नहीं थी।
सल्तनत के क्षेत्र दो भागों में विभाजित किये गए थें - 1. खलीसा (प्रत्यक्ष प्रशासित भूमि) और 2. जागीर (यह भूमि सहायक नदियों के नियंत्रण में थी)।
उस वक़्त इक्लिम नामक प्रान्तों में कई महानुभावों को उनके कार्य के बदले ज़मीनें मुफ्त में दी जातीं थी जिसे इक्तास कहते थें, इन प्रांतीय राज्यपालों को, जिन्हें ज़मीनें मुफ्त में दी जाती थी, वाली या मुक्ति के नाम से जाना जाता था जो शाही सरकार के नियंत्रण में रहते थें। वही कुछ प्रांतों में, साहिब-ए-दीवान को प्रांतीय आय को नियंत्रित करने के लिए नियुक्त किया गया था। प्रांतीय गवर्नर (governor) के नीचे उनके सहायता करने के लिए एक प्रांतीय वज़ीर, एक प्रांतीय अरीज़ और एक प्रांतीय क़ाज़ी थे।

स्थानीय शासन/ सरकार:
प्रांतों को एक शिक्दार (जिला प्रमुख) के तहत शिक् या जिले में विभाजित किया गया था। इन प्रत्येक शिक् में कुछ परगना या कसबा शामिल थें। इन परगानो के अधिकारी को आमिल काहा जाता था , जो राजस्व एकत्र किया करते थें। परगना का लेखा-जोखा मुशरिफ देखते थें और खाज़ानदार राज्य भंडार की देखभाल किया करते थें। जौनपुर सल्तनत में गाँव का अधिक महत्व था और यहाँ का सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी मुकद्दम या चौधरी के नाम से जाना जाता था।

संदर्भ:
1. https://en.wikipedia.org/wiki/Jaunpur_Sultanate
2. https://bit.ly/2Gj7ycr



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