शास्त्रीय संगीत जगत में ख्‍याल शैली का विकास

जौनपुर

 15-04-2019 02:09 PM
द्रिश्य 2- अभिनय कला

ख्याल गायकी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सबसे पुरानी शैलियों में से एक है। जिसने आज भी आधुनिक भारतीय संगीत में विशेष स्‍थान बनाया हुआ है। ख्‍याल का उद्भव 12वीं या 13वीं शताब्‍दी में ध्रुपद शैली से हुआ था। ज्यादातर ख्‍याल घराने पुराने ध्रुपदी घरानों से विकसित हुए हैं, इसलिए इसे कभी-कभी ध्रुपद की संतान भी कहा जाता है। किंतु इसकी वास्‍तविक उत्‍पत्ति के प्रत्यक्ष प्रमाण किसी के पास उपलब्‍ध नहीं हैं, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि आमिर खुसरो (1254-1325) ख्याल के जनक थे, किंतु इसके भी कोई प्रत्‍यक्ष प्रमाण उपलब्‍ध नहीं हैं।

मोहम्मद शाह को इस शास्त्रीय संगीत शैली का प्रचारक कहा जाता है, जिन्होंने अपने दरबार में बड़े उत्साह से इसे स्‍थान दिया। धीरे-धीरे, ख्याल ने आधुनिकता को धारण किया और अलाप, राग, तान, या बोल-तान जैसे नये विषयों को पेश किया। गायकों ने इस लयबद्ध गायन को बहुत उत्साह के साथ स्‍वीकार किया। यह भी माना जाता है कि जौनपुर के संगीतकार-सुल्तान मोहम्मद शर्की (1457-1476) के दरबार में ख्याल का विकास हुआ। किंतु मुगल शासक, मोहम्मद शाह रंगीले (1719-1748) के शासन के दौरान ख्‍याल नामक शैली से कोई परिचित नहीं था। अतः इसका स्‍पष्‍ट इतिहास बता पाना थोड़ा कठिन होगा।

ऊपर दिए गये चित्र में ख्याल के प्रसिद्ध गायक उल्हास काशलकर, मधुमिता रे, दीपक राजा इत्यादि को दिखाया गया है।

आज ख्‍याल को मुख्‍यतः दो रूपों बड़ा ख्‍याल और छोटा ख्‍याल में जाना जाता है। इन दोनों की गायन गति में भिन्‍नता होती है। बड़े ख्‍याल को धीमी या मध्‍यम गति में गाया जाता है। धीमी गति में प्रत्‍येक ताल को चार तालों तथा मध्‍यम गति में प्रत्‍येक ताल को दो या एक तालों में विभाजित किया जाता है। जबकि छोटा ख्‍याल हमेशा तेज गति में गाया जाता है तथा इसकी प्रत्‍येक ताल में एक ताल प्राप्‍त होती है। बड़े ताल को तबले के साथ स्‍पष्‍ट रूप से सुना जा सकता है। जैसे-जैसे बड़े ख्याल की प्रस्तुति आगे बढ़ती है, तो यह ज्यादा से ज्यादा तानों को गाया जाता है। तान बहुत मधुर होते हैं जो विशेष राग में ऊँचाइयों को नहीं छू सकते हैं। छोटा ख्याल लगभग अपरिवर्तनीय रूप से तीन ताल या एक ताल में होता है। संपूर्ण ख्‍याल इन दोनों के इर्द-गिर्द घूमता है।

20 वीं सदी के ख्याली गायक-
20 वीं सदी के जाने-माने ख्याल गायक भीमसेन जोशी, आमिर खान, राजन साजन मिश्रा, किशोरी अमोनकर, कुमार गंधर्व, मल्लिकार्जुन मंसूर, डी.वी. पलुस्कर, फैयाज खान, शराफत हुसैन खान, बडे गुलाम अली खान, हीराबागी बहरीन, हर्षबागी, केसरबाई केरकर मोगुबाई कुर्दीकर, नजाकत-सलामत अली खान, राशिद खान और उल्हास काशलकर, पंडित जसराज शामिल हैं।

ऊपर दी गयी तस्वीर में श्रीमती केसरबाई केरकर, को 1953 में राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा वार्षिक पुरस्कार प्राप्त करते दिखाया गया है।

ऊपर दिया गया चित्र पदम् भूषण गंगू बाई हंगल के सम्मान में सन 2014 में जारी की गयी डाक टिकट को दर्शाता है।

जौनपुर एक संगीतमय शहर है, ख्याल की उत्‍पत्ति जौनपुर से भी मानी जाती है। जौनपुर ने शास्त्रीय संगीत की दुनिया को "ख्याल" और जौनपुरी जैसे भावपूर्ण राग उपहार स्‍वरूप दिये हैं। राग जौनपुरी हिन्‍दुस्‍तानी शास्‍त्रीय संगीत के असावरी ठाट का एक राग है। ओंकारनाथ ठाकुर जैसे कुछ संगीतकार इसे शुद्धा ऋषभ असावरी से अलग मानते हैं। इसके आकर्षक स्वर इसे दक्षिण भारत में कई संयोजन के साथ कर्नाटक क्षेत्र में एक लोकप्रिय राग बनाते हैं। गुजरात में भी इसकी छाप देखने को मिलती है।आज ख्याल शास्त्रीय रूपों के सबसे जीवंत और भिन्न रूपों में से एक है जिसने प्रमुख शास्त्रीय और लोक रूपों की विशिष्ट विशेषताओं को अपने स्वेच्छिक अभ्यंतर में आत्मसात किया है। फिल्‍मी जगत के कई प्रसिद्ध गानों में जौनपुरी राग को स्‍थान दिया गया है।

ख्याल शैली के बारे में अधिक जानने के लिए आप हमारे प्रारंग के नीचे दिए हुए लिंक (Link) पर क्लिक करें

संदर्भ:
1. https://www.indianetzone.com/47/types_khayal.htm
2. https://www.indianetzone.com/35/origin_development_khayal_indian_music.htm
3. https://en.wikipedia.org/wiki/Jaunpuri
4. https://en.wikipedia.org/wiki/Khyal
चित्र सन्दर्भ :-
1. https://www.youtube.com/watch?v=jTJe1_1Rr0Y
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Kesarbai_Kerkar
3. https://bit.ly/2Ui8Itx



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