खाद्य सुरक्षा और पोषण में वनों की अहम भूमिका

जौनपुर

 11-03-2019 01:09 PM
जंगल

                                                  जीव-जगत की भूख मिटाते, ये सुंदर फलदार वृक्ष हैं।
                                                  जीवन का आधार वृक्ष हैं, धरती का श्रृंगार वृक्ष हैं।
                                                  ईश्वर के अनुदान वृक्ष हैं, फल-फूलों की खान वृक्ष हैं।
                                                  मूल्यवान औषधियां देते, ऐसे दिव्य महान वृक्ष हैं।

मानव की उत्‍पत्ति के साथ ही वनों ने मानव जीवन में एक अभिभावक के रूप में भूमिका निभाई अर्थात मानव अपनी मूलभूत आवश्‍यकताओं के लिए पूर्णतः वनों पर ही निर्भर था। आज मानव भले ही औद्योगिक जगत की ओर आगे बढ़ गया हो लेकिन आज भी वह प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रूप के अपनी आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए काफी हद तक वनों पर निर्भर है। व्‍यक्‍ति जंगल के बीच रहे या बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच लेकिन वह वनों से अछूता नहीं रह सकता है। वन हमारे जीवन का अभिन्‍न अंग हैं। वन हमारे परिस्थितिक तंत्र के संरक्षण, ऊर्जा, भोजन, आय, रोजगार इत्‍यादि के सृजन में अहम भूमिका निभाते हैं। यदि बात की जाए वैश्विक खाद्य आपूर्ति की तो इसमें वन प्रत्‍यक्ष रूप से मात्र 0.6 प्रतिशत का योगदान देते हैं, लेकिन वे आहार की गुणवत्ता और विविधता में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं और वनों पर निर्भर रहने वाले समुदायों को पूर्ण खाद्य सुरक्षा और पोषण (एफएसएन) भी प्रदान करते हैं।

बढ़ती वैश्विक आबादी के साथ, खाद्य सुरक्षा का अधिकांश हिस्सा कृषि उत्पादन को बढ़ाने और विस्तारित करने पर केंद्रित है। कई लोगों का कहना है कि हमने पर्याप्त मात्रा में भोजन को उत्पादित कर दिया है, भोजन में कमी मुख्य रूप से अपर्याप्त वितरण, क्रय क्षमता में कमी और अन्य गैर-उत्पादक कारणों से होती है। भविष्य में खाद्य सुरक्षा के लिए हम अकेले उत्पादन पर भरोसा नहीं कर सकते हैं।

जहाँ वन और वृक्ष-आधारित कृषि प्रणालियां विश्व स्तर पर लगभग एक अरब लोगों की आजीविका में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से योगदान करती हैं। वहीं पेड़ और वन कृषि के लिए पारिस्थितिकी तंत्र को व्यवस्थित रखते हैं और जंगली खाद्य पदार्थ खाद्य सुरक्षा और पोषण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन प्रणालियों की वजह से वृक्ष-आधारित कृषि प्रणालियाँ कम हो रही हैं और इससे जंगलों द्वारा दिए जाने वाले भोजन के योगदान को खतरा हो सकता है। कई ग्रामीण और छोटे समुदायों द्वारा सेवन किए जाने वाले जंगली फल और सब्जियां कई छोटे पोषक तत्वों का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

एशियाई क्षेत्र में हो रही कृषि, पशुधन, वानिकी और मत्स्य पालन के माध्यम से भोजन के उत्पादन की प्रक्रिया को समझ कर वैज्ञानिकों द्वारा संपूर्ण क्षेत्र में खाद्य सुरक्षा को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। एशिया में खाद्य और कृषि के लिए जैव विविधता राज्य पर परामर्श करने का उद्देश्य स्थायी उपयोग और संरक्षण के लिए आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं का आकलन करना है। विश्व के 17 बड़े विविधताओं वाले देशों में से पाँच एशिया में स्थित हैं, ये देश हैं चीन, भारत, इंडोनेशिया, मलेशिया और फिलीपींस, यहाँ पृथ्वी की अधिकांश प्रजातियाँ और बहुत अधिक संख्या में स्थानिक प्रजातियाँ हैं। वनों का विभिन्‍न रूपों में उपयोग देखने को मिलता है:

भोजन के रूप में: किसानों द्वारा पारंपरिक कृषि प्रणालियों में तथा पशुपालकों द्वारा चारे के स्रोत के रूप में वनों और वृक्षों का उपयोग किया जाता है।

ऊर्जा के रूप में: विश्‍व स्‍तर पर ऊर्जा के रूप में 6 प्रतिशत काष्‍ठ ईधन का उपयोग किया जाता है वहीं अफ्रीका में ऊर्जा के रूप में 27 प्रतिशत काष्‍ठ ईधन का उपयोग किया जाता है। जिसके माध्‍यम से विभिन्‍न कार्य सम्‍पन्‍न किये जाते हैं।

आय और रोजगार: अक्‍सर वनों के वास्‍तविक योगदान को राष्‍ट्रीय आय में नहीं गिना जाता है। जबकि 2011 के एक अनुमान के अनुसार औपचारिक वन क्षेत्र ने विश्‍व में लगभग 1 करोड़ 32 लाख लोगों को रोजगार दिया तथा विश्‍व सकल घरेलू उत्‍पाद में 0.9 प्रतिशत का योगदान दिया।

मानव स्वास्थ्य और कल्याण: वन आधारित कृषि प्रणाली और वानिकी विभिन्‍न तरीकों से हमारे स्‍वास्‍थ्‍य पर प्रभाव डालती है, जिनमें खाद्य, औषधीय पौधे, ईंधन, स्वच्छ जल और आय इत्‍यादि शामिल हैं। वन मानव के मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य पर भी सकारात्‍मक प्रभाव डालते हैं।

पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षक के रूप में: विश्‍व के पारिस्थितिकी तंत्र तथा जैव विविधता को संरक्षित करने में वन अहम भूमिका अदा करते हैं। साथ ही जलवायु को जीव तथा कृषि के अनुकूल बनाए रखने में महत्‍वपूर्ण योगदान देते हैं।

वन आवरण, वन प्रकारों और इसके प्रबंधन में परिवर्तन का खाद्य सुरक्षा और पोषण में काफी प्रभाव देखने को मिलता है। 1990 और 2015 के बीच, अधिकांश क्षेत्रों में प्राथमिक और द्वितीयक वनों सहित प्राकृतिक वन क्षेत्र में लगातार कमी देखी गई, और लगाए गए वनों में तेजी से वृद्धि हुई है। प्राथमिक वनों की हानि विशेष चिंता का विषय है क्योंकि वे जैव विविधता का प्रमुख भंडार हैं। वनों की अंधाधुन कटाई से इस पर निर्भर रहने वाले लोगों का जीवन संकट में आ रहा है। कृषि विस्तार के लिए वनों की कटाई को अक्‍सर एक अच्‍छे कदम के रूप में देखा जाता है, इसके तत्कालिक लाभों को देखते हुए आगामी खतरे जैसे प्राकृतिक संसाधनों की कमी को नजरअंदाज कर दिया जाता है। भूमि, जंगल और पेड़ों की बढ़ती मांग, खाद्य सुरक्षा और पोषण में वनों के योगदान के लिए नई चुनौती बनती जा रही है।

सहभागी वन नियोजन और प्रबंधन नीतियों और उपायों को विकसित किया जाए तथा इनको बढ़ावा दिया जाए। वन संसाधनों के स्थायी प्रबंधन और उपयोग के माध्यम से स्थानीय समुदायों में आय सृजन और आजीविका के अवसरों को बढ़ावा दिया जाए और उन्‍हें सक्षम बनाया जाए, विशेष रूप से पहाड़ों और अन्य दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वालों लोगों को। स्थायी आजीविका, संस्कृति और कल्याण के लिए समुदाय-संचालित, वन-आधारित उद्यमों का समर्थन करने के लिए सार्वजनिक निवेश में वृद्धि की जाए। ईंधन और लकड़ी के स्टोव के उपयोग से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने के लिए सामाजिक और तकनीकी नवाचारों में निवेश किया जाए।

एफएसएन में सुधार करने हेतु स्थायी वन प्रबंधन रणनीतियों को सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न पैमानों पर वानिकी, कृषि, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में नीतिगत सामंजस्य को मजबूत करना। एफएसएन के लिए वन उत्पादों के टिकाऊ उत्पादन और खपत हेतु प्रभावी प्रोत्साहन को बढ़ावा देना। एफएसएन के लिए वनों और पेड़ों के प्रशासन के लिए अधिकारों पर आधारित दृष्टिकोण को बढ़ावा देना, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून और मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करना, जिसमें पारदर्शिता और जवाबदेही के मानक शामिल हों। सुनिश्चित किया जाए की जंगलों और पेड़ों पर बनाए जाने वाले कानून, नीतियां और कार्यक्रम एफएसएन को प्रभावित ना करते हों। क्‍योंकि विश्‍व की जनसंख्‍या का काफी हिस्‍सा वनों पर निर्भर है:

संदर्भ:
1. https://bit.ly/2JeyPl8
2. https://www.cifor.org/library/4103/
3. https://bit.ly/2J3pQCZ



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