अतिरिक्‍त आय का एक अच्‍छा विकल्‍प चकोतरे की खेती

जौनपुर

 26-02-2019 11:03 AM
साग-सब्जियाँ

यदि आप कभी भी जौनपुर के राजा के महल के पास से गुजरते होंगे, तो आपको सबसे पहले उनके बगीचे में पेड़ और पौधों अभिवादन करते दिखाई देंगे, और अगर आप बारीकी से देखें, तो आपको रास्ते में एक चमकीले पीले रंग के फलों वाला वृक्ष खड़ा मिलेगा। इस फल को 'पोमेलो' (Pomelo) या 'चाकोतरा' कहा जाता है।

विश्‍व में नींबू की विभिन्‍न प्रजातियां पायी जाती हैं, जिनमें से एक चकोतरा या पोमेलो भी है, यह नींबू-प्रजाति के सबसे बड़ी आकृति वाले फलों में से एक है। यह हरे-पीले रंग का खट्टा-मीठा रसदार फल मूलतः एशिया के दक्षिण और दक्षिणपूर्वी भागों में पाया जाता है। बढ़ती लोकप्रियता के कारण, यह दुनिया के कई अन्य हिस्सों में लगाया जाने लगा है। इसे तुर्की, क्यूबा, ब्राजील, बेलिज़, साइप्रस, अर्जेंटीना, ट्यूनीशिया, ईरान आदि देशों में भी लगाया जाता है।

"साइट्रस: द जीनस साइट्रस" पुस्तक के अनुसार चकोतरे की उत्‍पत्ति संभवतः मलेशिया और मलेशियाई द्वीपसमूह में हुयी। "थाई-इंग्लिश डिक्शनरी" के अनुसार, चकोतरा जावा से भारत लाया गया था। यह मुख्‍यतः बलविया, इंडोनेशिया के रास्ते भारत पहुंचा, इसलिए इसे बाताबी-लेबू भी कहा जाता है। चकोतरे का वैज्ञानिक नाम साइट्रस मैक्सिमा (Citrus Maxima) या साइट्रस ग्रान्डिस (Citrus Grandis) है। संभवतः भारत का अपना साइट्रस मेडिका (या साइट्रोन) अन्य किस्मों को उत्‍पन्‍न करने के लिए फल के साथ संकरित होता है। वास्तव में, एक खट्टा चकोतरा असम का मूल निवासी भी है। भारतीय लोकसाहित्‍यों में, इसे सभी खट्टे फलों में स्‍थान दिया गया है।

भारत में इस फल के लिए व्यावसायिक दृष्टि से बहुत रुचि नहीं है, हालांकि मणिपुर जैसे कई क्षेत्रों में धार्मिक उद्देश्यों के लिए चकोतरे का उपयोग किया जाता है। चकोतरा भारत के सुदूर पूर्वोत्तर क्षेत्रों (जैसे पश्चिम बंगाल, मणिपुर में) और कुछ दक्षिणी क्षेत्रों जैसे कि बैंगलोर और केरल में भी उगाया जाता है। असम और त्रिपुरा भी 1,500 मीटर तक इस फल की खेती करते हैं। यह फल नवंबर से दिसंबर के महीने में लगते हैं, इसी दौरान यह बाजारों में बिकने आते हैं। चकोतरे का वजन 1-2 किलो तक हो सकता है। इस गूदेदार फल का स्‍वाद कड़वाहट और अम्‍लता रहित होता है। इसमें अन्‍य खट्टे फलों की तुलना में अधिक झिल्‍ली होती हैं। इस फल का छिलका मोटा होता है जिसे खाया नहीं जा सकता है, लेकिन इसके छिलके को मुरब्बा और अन्य पारंपरिक उत्पादों में उपयोग किया जाता है। इसका गुदा खट्टा-मीठा और स्‍वदिष्‍ट होता है।
विभिन्‍न शोधों के माध्‍यम से चकोतरे के अनेक स्‍वास्‍थ्‍य लाभ देखे गये हैं:
1. "भारतीय औष‍धीय वनस्‍पति" पुस्तक में चकोतरे का उपयोग कार्डियोटोनिक (Cardiotonic) के रूप में बताया गया है। इसकी पत्तियों, छिलकों और फूलों में प्रबल दर्दनाशक क्षमता होती है। पत्तियां कोरिया, मिर्गी, रक्तस्रावी रोगों और खांसी के उपचार में लाभदायक होती हैं। चकोतरे की पत्ती का तेल उनकी कवकनाशी गतिविधियों के लिए प्रभावी है, तथा इसकी छाल में रोगाणुरोधी गुण होते हैं।
2. - मधुमेह और मेटाबोलिक सिंड्रोम से सम्बंधित एक प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, चकोतरे के छिलके में उच्च रक्तचाप को कम करने की प्रबल क्षमता है तथा यह व्यक्तियों का टाइप -2 मधुमेह का उपचार करने में मदद कर सकता है।
3. ISRN फार्माकोलॉजी (Pharmacology) में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, चकोतरे की पत्तियों के मेथनॉल अर्क ने कार्सिनोमा सेल-उपचारित चूहों में ट्यूमर के आकार को कम करके एंटीट्यूमर गतिविधि को दर्शाया।
4. फूड एंड केमिकल टॉक्सिकोलॉजी द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है, कि चकोतरे के तेल में शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट, एंटीफंगल और एंटी-एलोटॉक्सजेनिक होता है।
5. चकोतरा हृदय के लिए लाभदायक होता है। यह खराब कोलेस्ट्रॉल को दूर रखता है और हृदय को स्वस्थ रखता है।
6. चकोतरे का सेवन त्वचा के लिए फायदेमंद होता है। इससे त्वचा चिकनी और चमकदार हो जाती है। यह त्वचा की समस्याओं की संभावनाओं को भी कम करता है।
7. चकोतरा विटामिन-सी से भरपूर होता है। यह शरीर को संक्रमणों से लड़ने में मदद करता है तथा शरीर को स्वस्थ और मजबूत बनाए रखता है।

विभिन्‍न स्‍वास्‍थ्‍य लाभों के बाद भी इसमें कुछ हानि देखने को मिलती है:
• केंसर की दवा टैमोक्सिफ़ेन (Tamoxifen) का प्रभाव चकोतरा खाने से कम हो जाता है।
• कोलेस्टेरॉल कम करने की औषधि स्टैटिन (Statin) जिसे हृदय रोग से बचने के लिए लिया जाता है। चकोतरा इसका प्रभाव कम करता है।
• दर्दनाशक और खांसी रोधी दवा कोडीन (Codeine) की दर्दनाशक क्षमता चकोतरे के उपयोग से कम हो जाती है।
• चकोतरा खाने से रक्त में पैरासिटामोल का संकेंद्रण बढ़ सकता है। यह यकृत के लिए हानिकारक हो सकता है।
• इस प्रकार कई दवाएं हैं जिन पर चकोतरे के सेवन का विपरित प्रभाव पड़ता।

फलों की खेती के व्यवसाय में चकोतरा काफी लोकप्रिय है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी खेती करना सबसे ज्‍यादा आसान है। यदि खेती सही तरीके से की जाए तो इसकी पैदावार और गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है। अच्छी गुणवत्ता वाले फल बाजार में बहुत अच्छी कीमत प्राप्त कर सकते हैं। यदि इस फल की खेती में उचित खेती तकनीकों का उपयोग और रखरखाव ना किया जाए तो फल की गुणवत्ता घट सकती है।
दुनिया भर में चकोतरे की विभिन्न किस्मों की खेती की जाती है:
1. कॉकटेल (Cocktail) चकोतरा संकर
2. चांडलर पुमेल (Chandler Pummel)
3. सरवाक पुमेल (Sarawak Pummel)
4. मेलोगोल्‍ड (Melogold)
5. रेंकिंग पुमेल (Reinking Pummel)
6. थिंग डी पुमेल (Thing Dee Pummel)
7. ताहितियन पुमेल (Tahitian Pummel)
8. ओरोब्‍लेंको (Oroblanco)
9. वेलेंटाइन पुमेल (Valentine Pummel)

चकोतरे की खेती के लिए उपयुक्‍त मिट्टी
चकोतरे की खेती के लिए विभिन्‍न प्रकार की मिट्टी जैसे कठोर, मोटी, रेतीली आदि मिट्टी का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन, मिट्टी को अकार्बनिक लवण रहित होना चाहिए। अच्छी वृद्धि के लिए, मिट्टी को उपजाऊ और कार्बनिक पदार्थों से युक्‍त होना चाहिए। चकोतरे की खेती के लिए आदर्श ph 5.5-6.5 है।

चकोतरे की खेती के लिए उपयुक्‍त जलवायु
चकोतरा मुख्‍यतः ठंडी जलवायु में होता है। यह उष्णकटिबंधीय के निचले हिस्सों में भलिभांति पनपता है। चकोतरे की खेती समुद्र तल से 400 मीटर तक की ऊंचाई पर ही की जानी चाहिए। इसकी वृद्धि के लिए आदर्श तापमान 25-30 डिग्री सेल्सियस है। पोमेलो की खेती के लिए 1500-1800 मिमी की वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। नदी के किनारे इसकी खेती एक अच्‍छा विकल्‍प है।

चकोतरे की खेती के लिए भूमि की तैयारी
चकोतरे की खेती सादी भूमि तथा ढलानदार भूमि दोनों में की जा सकती है। इसकी खेती के लिए सर्वप्रथम एक उचित साइट का चयन करना होगा। जहां से खरपतवार और अन्य पौधों को साफ करना होगा। मिट्टी को सही अवस्‍था में लाने के लिए 2-3 बार जुताई करनी होगी। इसके बाद मि‍ट्टी में खाद मिलानी चाहिए। उचित जलीय प्रणाली की व्‍यवस्‍था की जानी चाहिए। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम जैसे मैक्रोन्यूट्रिएंट्स को विभाजित खुराकों में डालना चाहिए। सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से बचने के लिए, नियमित अंतराल पर सूक्ष्म पोषक तत्वों का छिड़काव भी किया जाना चाहिए। उर्वरकों के उपयोग से पहले एक मृदा परीक्षण किया जाना चाहिए। उर्वरक के उपयोग के बाद, एक हल्की सिंचाई करनी चाहिए। रासायनिक उर्वरकों के साथ, जैविक उर्वरकों और खादों को भी खेत में उपयोग किया जाना चाहिए।

चकोतरे की खेती के लिए बुवाई के तरीके
चकोतरे को आमतौर पर बीज के माध्यम से लगाया जाता है। वे अलैंगिक विधियों के माध्यम से भी लगाया जाता है। अलैंगिक तरीकों में काटना, मुकलन, ग्राफ्टिंग, वायवीय अंकुरण आदि शामिल हैं। ग्राफ्टिंग और मुकलन के लिए मातृ पौधे रोग मुक्त होना आवश्‍यक है। बीजों के मामले में, उचित और रोग मुक्त बीजों का चयन करना चाहिए। फल को परिपक्व होने में लगभग 140-160 दिन लगते हैं। पकने पर फल का रंग बदलने लगता है। फलों को चुनने के लिए नेट का उपयोग किया जा सकता है।

चकोतरे की फसल को अन्य पौधों जैसे केला, एरेका ताड़ आदि के साथ उगाया जा सकता है। इस तरह से खेत में खाली स्‍थान का सदुपयोग किया जा सकता है और चकोतरे के वृक्ष पौधों को हवा से बचाते हैं तथा उन्‍हें छाया प्रदान करते हैं। यह अंतर-फसल अतिरिक्‍त आय का एक अच्‍छा विकल्‍प है। फलों की कटाई के बाद उन्हें श्रेणीबद्ध और क्रमबद्ध करके, इसे डिब्बों या बक्से में पैक कर विपणन के लिए स्थानीय बाजार या अंतरराष्ट्रीय बाजार में भेजा जा सकता है।

संदर्भ:
1. http://theindianvegan.blogspot.com/2013/02/all-about-chakkota.html
2. https://bit.ly/2U7ejna
3. https://www.agrifarming.in/pomelo-cultivation/
4. https://www.knowfarming.com/pomelo-farming-information



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