थ्री-डी प्रिण्टिंग का तकनीक जगत में विकास

जौनपुर

 16-01-2019 12:14 PM
संचार एवं संचार यन्त्र

आज त्रि-विमीय (three-dimensional) वस्तुएँ बनाने की विधियों में से एक त्रिविम मुद्रण या 'थ्री-डी प्रिंटिंग ' अत्‍यंत प्रसिद्ध होती जा रही है। 3 डी प्रिंटिंग की कई भिन्‍न-भिन्‍न प्रक्रियाएं हैं, जिनमें से फ़्यूज़ डिपॉज़िट मॉडलिंग (fused deposition modeling (FDM)) काफी लोकप्रिय है। इस विधि में कम्प्यूटर के नियन्त्रण में वस्तु पर किसी पदार्थ की परत-दर-परत डालते जाते हैं और वस्तु तैयार होती जाती है, निर्माण से पूर्व वस्तु का त्रिविम डेटा स्रोत तैयार किया जाता है। तैयार वस्तुएं किसी भी आकार और ज्यामिति वाली हो सकती हैं। इसे हम त्रिविम प्रिण्टर एक औद्योगिक रोबोट (robot) भी कह सकते हैं। सामान्‍यतः डिजिटल मॉडल डेटा का उपयोग करके 3D मॉडल तैयार किए जाते हैं। थ्री-डी प्रिंटिंग ' का सफर 90 के दशक से प्रारंभ हो गया था तथा विभिन्‍न चरणों में चलकर इसने वर्तमान स्‍वरूप प्राप्‍त किया। इसका क्रमिक विकास इस प्रकार रहा है:

1981: 1980 के दशक में प्रारंभिक योज्य उपकरण और सामग्री विकसित की गई थी। 1981 में, नागोया म्युनिसिपल इंडस्ट्रियल रिसर्च इंस्टीट्यूट (Nagoya Municipal Industrial Research Institute) के हिदेओ कोडामा ने फोटो-हार्डिंग थर्मोसेट पॉलीमर के साथ तीन-आयामी प्लास्टिक मॉडल बनाने के लिए दो योगशील तरीकों का आविष्कार किया, जहां यूवी एक्सपोज़र (UV exposure) क्षेत्र को मास्क पैटर्न या स्कैनिंग फाइबर ट्रांसमीटर (scanning fiber transmitter) द्वारा नियंत्रित किया जाता था।

1984: 16 जुलाई 1984 को, एलेन ले मेहौट, ओलिवियर डी विट्टे और जीन क्लाउड एंड्रे ने स्टीरियोलिथोग्राफी (stereolithography) प्रक्रिया के लिए अपना पेटेंट (patent) दायर किया। फ्रांसीसी आविष्कारकों के इस अनुप्रयोग को फ्रेंच जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी (अब अल्काटेल-अलस्टॉम) और CILAS (द लेजर कंसोर्टियम (The Laser Consortium)) द्वारा य‍ह कहकर छोड़ दिया गया था कि इसमें "व्यावसायिक दृष्टिकोण की कमी है"। तीन हफ्ते बाद 1984 में, 3D सिस्टम कॉर्पोरेशन के चक हल ने एक स्टीरियोलिथोग्राफी फ़ेब्रिकेशन सिस्टम (Stereolithography Fabrication system) के लिए अपना पेटेंट दायर किया, जिसमें पराबैंगनी किरण (ultraviolet rays) के साथ प्रकाश बहुलक के उपचार से परतों को जोड़ा गया था। स्टीरियोलिथोग्राफी में हल का योगदान आज भी फ़ाइल स्वरूप और डिजिटल स्लाइसिंग (digital slicing) और इन्फिल (infill) जैसी प्रक्रियाओं में उपयोग किया जाता है।

1988: सबसे आधुनिक 3D प्रिंटर द्वारा उपयोग की जाने वाली तकनीक - फ़्यूज़ डेपोज़िशन मॉडलिंग (fused deposition modeling), प्लास्टिक एक्सट्रूज़न (plastic extrusion) का एक विशेष अनुप्रयोग, एस स्कॉट क्रम्प द्वारा 1988 में विकसित किया गया तथा उनकी कंपनी स्ट्रैटासिस द्वारा इसका व्यवसाय किया गया था।

1993: 1993 में एमआईटी (MIT) में विकसित स्‍टेंडर्ड (standard) और कस्टम इंकजेट प्रिंट हेड्स (custom inkjet printing heads) को नियोजित करने वाली पाउडर बेड प्रक्रिया को 3 डी प्रिंटिंग कहा जाता था। सोलिजेन टेक्नोलॉजीज (soligen technologies), एक्सट्रूड हॉन कॉर्पोरेशन और जेड कॉर्पोरेशन द्वारा इसका व्यवसायीकरण किया गया। इसी वर्ष सोलिडस्केप नामक एक कंपनी की शुरुआत हुयी, जिसमें घुलनशील समर्थन संरचनाओं के साथ एक उच्च-परिशुद्धता बहुलक जेट निर्माण प्रणाली ("डॉट-ऑन-डॉट" तकनीक के रूप में वर्गीकृत) शुरू की।

1995: 1995 में फ्राउनहोफर संस्थान ने चयनात्मक लेजर विगलन प्रक्रिया विकसित की।

2009: फ्यूज्ड डिपोजिशन मॉडलिंग (Fused Deposition Modeling (FDM)) प्र‍िंटिंग प्रक्रिया पेटेंट 2009 में समाप्त हो गया।

तकनीक विकास के साथ कई लेखकों ने यह अनुमान लगाना शुरू कर दिया था कि 3 डी प्रिंटिंग विकासशील दुनिया के निरंतर विकास में सहायता कर सकती है।

2012: फिलाबोट ने प्लास्टिक के साथ लूप को बंद करने के लिए एक प्रणाली विकसित की और किसी भी FDM या FFF 3D प्रिंटर के लिए प्लास्टिक की एक विस्तृत श्रृंखला को प्रिंट करने के लिए सक्षम बनाया।

2013: नासा (NASA) के कर्मचारी सामंथा स्नेब्स और मैथ्यू फिडलर ने बड़े प्रारूप, किफायती 3 डी प्रिंटर, गीगाबॉट का पहला प्रोटोटाइप बनाया और 3 डी प्रिंटिंग कंपनी री: 3 डी को लॉन्च किया।

2018: री: 3डी द्वारा एक प्रणाली विकसित की गयी जिससे बेकार प्लास्टिक को पिसा जा सकता था।

थ्री-डी प्रिण्टिंग सामान्‍यतः तीन सिद्धान्‍तों पर कार्य करती है- मोडलिंग (Modeling), प्रिंटिंग (Printing), फिनिशिंग (Finishing):

मोडलिंग

3 डी प्रिंट करने योग्य मॉडल एक कंप्यूटर एडेड डिजाइन (computer-aided design (CAD)) पैकेज के साथ, 3 डी स्कैनर के माध्यम से, या एक सादे डिजिटल कैमरा और फोटोग्राममेट्री सॉफ्टवेयर (photogrammetry software) द्वारा बनाया जा सकता है। 3 डी में प्रिंट किये गए मॉडल सीएडी के परिणामस्वरूप त्रुटियां कम होती है यदि हो भी जाएं तो इसे प्रिंटिंग से पहले सही किया जा सकता है साथ ही इसमें प्रिंट होने से पहले वस्‍तु के डिजाइन में सत्यापन की अनुमति मिलती है। 3 डी स्कैनिंग एक वास्तविक वस्तु के आकार और उपस्थिति पर डिजिटल डेटा एकत्र करने की एक प्रक्रिया है, जो इसके आधार पर एक डिजिटल मॉडल बनाता है। इस प्रक्रिया को पहला चरण भी कहा जाता है, इसमें प्र‍िंटिंग से ठीक पहले की तैयारी शामिल है, जिसमें आप उस वस्‍तु की 3D फ़ाइल डिज़ाइन करते हैं जिसे आप प्रिंट करना चाहते हैं। यह 3D फाइल CAD सॉफ्टवेयर का उपयोग करके बनाई जा सकती है, जिसमें 3D स्कैनर या केवल ऑनलाइन भी डाउनलोड किया जा सकता है। एक बार जब आपने जाँच लिया कि आपकी 3 डी फाइल प्रिंट होने के लिए तैयार है, तो आप दूसरे चरण पर जा सकते हैं।

प्रिंटिंग

दूसरा चरण वास्तविक प्र‍िंटिंग प्रक्रिया है। जिसमें सबसे पहले आप उन सामग्रियों का चयन करते हैं जो आपकी वस्‍तु को विशिष्ट गुण प्रदान करेगी। 3 डी प्रिंटिंग में प्रयुक्त सामग्री की विविधता बहुत अधिक है। इसमें प्लास्टिक, मिट्टी के पात्र, धूना, धातु, रेत, वस्त्र, बायो मटेरियल (biomaterials), कांच, और चंद्र धूल शामिल है। इनमें से अधिकांश सामग्री बहुत सारे परिष्करण विकल्पों की अनुमति देती हैं, जो आपके मनचाहे डिजाइन को पूरा करने में सहायता करती हैं। STL फ़ाइल से 3D मॉडल प्रिंट करने से पहले, त्रुटियों की जांच करनी चाहिए। अधिकांश CAD अनुप्रयोग निम्न प्रकार के आउटपुट STL फ़ाइलों में छिद्र, स्वप्रतिच्छेद, ध्‍वनि आवरण जैसी बहुविध त्रुटियां उत्पन्न हो सकती हैं। एसटीएल पीढ़ी को "सुधार" के रूप में जाना जाता है, जो मूल मॉडल में इस प्रकार की समस्याओं को ठीक करता है। सामान्‍यतः एसटीएल जो 3 डी स्कैनिंग के माध्यम से प्राप्त मॉडल से उत्पन्न होते हैं, अक्सर इनमें से अधिक त्रुटियां होती हैं। एक बार पूरा हो जाने पर, एसटीएल फ़ाइल को "स्लाइसर" (slicer) नामक सॉफ्टवेयर के एक खण्‍ड द्वारा परिष्‍कृ‍त किया जाना चाहिए, जो मॉडल को पतली परतों की एक श्रृंखला में परिवर्तित करता है और एक विशेष प्रकार के 3 डी प्रिंटर (FDM प्रिंटर) के अनुरूप जी-कोड फ़ाइल का निर्देश देता है। यह जी-कोड फ़ाइल को 3 डी प्रिंटिंग क्लाइंट सॉफ़्टवेयर (जो जी-कोड लोड करता है, और 3 डी प्रिंटिंग प्रक्रिया के दौरान 3 डी प्रिंटर को निर्देश देने के लिए उपयोग करता है) के साथ प्रिंट किया जा सकता है।

फिनिशिंग

यद्यपि प्रिंटर-निर्मित रिज़ॉल्यूशन (resolution) कई अनुप्रयोगों के लिए पर्याप्त है, लेकिन मानक रिज़ॉल्यूशन में वांछित वस्‍तु के थोड़े बड़े संस्करण को प्रिंट करके और उच्च-रिज़ॉल्यूशन सबट्रैक्टिव प्रक्रिया के माध्‍यम से सामग्री को हटाकर अधिक सटीकता प्राप्त की जा सकती है। इस चरण के लिए विशिष्ट कौशल और सामग्री की आवश्यकता होती है। जब वस्‍तु पहली बार मुद्रित होती है, तो अक्सर इसे सीधे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है या तब तक वितरित नहीं किया जा सकता है जब तक कि इसे लाख या रंग नहीं किया गया हो।

भारत में निर्माता के स्थान में बड़े पैमाने पर युवा उद्यमी शामिल हैं, जिनके पास 3 डी प्रिंटर खरीदने के साधन नहीं होते हैं। इन प्रिंटरों की लागत भी सामान्‍य से कहीं अधिक होती है, अतः इसे भारत में बढ़ावा देने के लिए एक प्रेरणा की आवश्‍यकता होगी जिससे युवा वर्ग इसे र्स्‍टाटप (startup) के रूप में अपनाएं। यह उद्योग विकास को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने में सक्षम है। भारत के कई प्रमुख 3 डी प्रिंटर निर्माताओं का कहना है कि उनकी कंपनी इस छेत्र में पिछले कीच वर्षों में काफी वृद्धि देखी है। यह भारत में अभी इसकी एक शुरूआत है, जो समय और आवश्‍यकता के साथ तीव्रता से गति पकड़ेगा।

संदर्भ :

1. https://en.wikipedia.org/wiki/3D_printing
2. https://www.sculpteo.com/en/3d-printing/3d-printing-technologies/
3. https://bit.ly/2QkeF7H



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