जानवरों को मृत्यु के बाद भी जीवित रखने की एक कला, चर्मपूरण

जौनपुर

 15-12-2018 01:27 PM
द्रिश्य 3 कला व सौन्दर्य

कभी भी यदि आप किसी संग्रहालय गए होंगे तो आपको वहाँ जीवित दिखने वाले पशु, पक्षी, या अन्य जानवर देखने को मिले होंगे। असल में यह एक कला है, जी हाँ, विलुप्त हो रहे जानवर या शिक्षा के लिए इस कला में जानवरों की खाल को तैयार करके उसे भरकर प्राकृतिक स्वरूप प्रदान किया जाता है। चर्मपूरण (टैक्सिडेर्मी (Taxidermy), ग्रीक के टैक्सि (अर्थ - व्यवस्था) + डेर्मी (अर्थ - त्वचा)) मृत प्राणियों को सुरक्षित रखने तथा उन्हें जीवित सदृश व्यवस्थित कर प्रदर्शित करने की एक विधि है। चर्मपूरण की कला का इस्तेमाल जौनपुर सहित भारत के कई राजघरों द्वारा किया जाता था।

प्राचीन समय से ही जानवरों की खाल को संरक्षित किया जा रहा है। मिस्र की मम्मी (mummies) के साथ शावलेप किये जानवर पाए गये थे। यद्यपि प्राचीन समय में जानवरों को ज्यों का त्यों शवपेलित किया जाता था, जो चर्मपूरण नहीं माना जाता है। ज्योतिषियों और अत्तारों द्वारा मध्य युग में, चर्मपूरण के कई बेडौल उदाहरण प्रदर्शित किए गए थे। वहीं 1748 में फ्रांस में रयूमर द्वारा प्राकृतिक इतिहास के लिए पक्षियों के संरक्षण के लिए सबसे शुरुआती विधि प्रकाशित की गई थी। 1752 में एम बी स्टोलस द्वारा चर्मपूरण का ढांचा खड़ा करने के तकनीकों का वर्णन किया गया था। वहीं इस समय तक फ्रांस, जर्मनी, डेनमार्क और इंग्लैंड में चर्मपूरण के कई संचालन थे। वहीं कुछ समय तक जानवरों के कई हिस्सों को आकार देने के लिए चिकनी मिट्टी का उपयोग किया जाता था, परंतु यह प्रतिरूप को भारी कर देता था। 19वीं शताब्दी में लुई डुफ्रेसेन (नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री (National museum of natural history) में चर्म प्रसाधक) द्वारा अरसेनिक्ल (arsenical) साबुन को एक लेख में प्रकाशित किया जिसकी मदद से संग्रहालय ने दुनिया में पक्षियों का सबसे बड़ा संग्रह बनाने में कामयाबी हासिल की। 20वीं शताब्दी की शुरुआत में, कार्ल अकेले, जेम्स एल.क्लार्क, विलियम टी.हॉर्नडे, कोलमन जोनास, फ्रेडरिक और विलियम कैम्फेर और लियोन प्रेय, जैसे कलाकारों के संचालन में चर्मपूरण को एक नया रूप दिया गया। इन्होंने और अन्य चर्म प्रसाधकों ने रचनात्मक रूप से सटीक आक्रितियां विकसित किए, जिसने सटिक बनावट के साथ-साथ कलात्मक रूप से भरवां प्रदान किया।


चर्मपूरण में इस्तेमाल की जाने वाली विधियां निम्न हैं :-

ट्रेडिशनल स्किन-माउंट (Traditional skin-mount):
चर्म प्रसाधक के अभ्यास के लिए विधियों में काफी परिवर्तन आ गया है, चर्मपूरण की गुणवत्ता बढ़ रही है और विषाक्तता कम हो रही है। इसमें पहले जानवर के शरीर से उसके खाल को निकाला जाता है, इस विधि में खाल के आंतरिक अंगों या रक्त को देखे बिना ऊपरी भाग से ही खाल को निकाला जाता है। फिर इसे लकड़ी, ऊन और तार या एक पॉलीयूरेथेन (Polyurethane) से बने पुतले पर चढ़ाया जाता है। इसके बाद चिकनी मिट्टी के इस्तेमाल से उसमें कांच की आंखे लगायी जाती हैं।

फ्रीज़ ड्राइड माउंट (Freeze dried mount):
इस विधि में जानवर को पहले जमाया जाता है और फिर उसको सुखाया जाता है। उसके बाद उसके आंतरिक अंग हटा दिए जाते हैं; हालांकि, शरीर में अन्य सभी ऊतक मौजूद रहते हैं। उसके बाद जानवर को वांछित मुद्रा में रखा जाता है, फिर विशेष रूप से इसके लिए डिजाइन की गई फ्रीज़ ड्राइंग मशीन (Freeze drawing machine) पर रखा जाता है। यह जानवर को जमाने के साथ कक्ष में वैक्यूम भी बनाती है।

रिप्रोडक्शन माउंट (Reproduction mount):
कई विधियां जानवरों के वास्तविक शरीर को संरक्षित करने के बजाए, उनकी विस्तृत तस्वीरें और माप लिया जाता है। ताकि एक चर्म प्रसाधक उस तस्वीर और माप की मदद से राल या शीसे रेशा में एक सटीक प्रतिकृति बना सके, जिसे वास्तविक जानवर के स्थान पर प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार के माउंट में किसी भी जानवर को कोई हानि नहीं पहुंचाई जाती है।

री-क्रिएशन माउंट (Re-creation mount):
इसमें मौजूदा या विलुप्त प्रजातियों का सटीक जीवन-आकार को बनाया जाता है, इसमें इस्तेमाल की जाने वाली सामग्रियां बनाए हुए जानवर के शरीर की ना होकर अन्य जानवर की खाल, पंख और त्वचा का उपयोग किया जाता है। री-क्रिएशन माउंट का एक प्रसिद्ध उदाहरण चर्म प्रसाधक केन वाकर द्वारा निर्मित एक विशाल पांडा है जिसे उन्होंने सारंग और प्रक्षालित काले भालू फर से बनाया है।

भारत के एकमात्र अभ्यास चर्म प्रसाधक डॉ संतोष गायकवाड़, जो एक पशु चिकित्सक हैं, ये भारत के कई जानवरों को भविष्य के लिए संरक्षित कर रहे हैं। अब तक उन्होंने 12 बड़ी बिल्लियां, एक घोड़ा, एक 140 वर्षीय कछुआ, जो 6.3 फीट का और 250 किलोग्राम वजन का था, एक नौ फीट का मगरमच्छ और 400 से अधिक पक्षियों, जिनमें मराल, मोर और गंभीर रूप से लुप्तप्राय ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (Great Indian Bustard) शामिल हैं।

आप चर्मपूरण में अपना भविष्य भी बना सकते हो, इसके लिए किसी भी विषय में स्नातक की डिग्री होनी चाहिए और उसके बाद किसी भी मान्यता प्राप्त कॉलेज से आप इसका कोर्स कर सकते हैं। इस कोर्स के खत्म होने के बाद चर्मपूरण से सम्बंधित कई नौकरियां शामिल हैं। मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में भारत का एकमात्र चर्मपूर्ण केंद्र है।

संदर्भ:
1.https://en.wikipedia.org/wiki/Taxidermy
2.https://www.etymonline.com/word/taxidermy
3.https://www.rediff.com/getahead/report/meet-indias-only-practising-taxidermist/20170104.htm
4.https://timesofindia.indiatimes.com/home/education/news/how-to-become-a-taxidermist/articleshow/63265654.cms



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