हाफ़िज़ की कविताएं 500 वर्षों तक बनी रहीं जौनपुर में लोकप्रिय

जौनपुर

 17-11-2018 04:22 PM
ध्वनि 2- भाषायें

‘जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि’

कवि वह है जो भावों को अपने शब्दों के माध्यम से इस प्रकार बयां करते हैं कि पढ़ने या सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो उठते हैं, ऐसा लगता है कि मानो कल्पना और यथार्थ के बीच कोई फर्क ही ना रहा हो। इस प्रकार के गहन यथार्थ का वर्णन तो बस एक कवि ही कर सकता है। ऐसे ही एक प्रसिद्ध फ़ारसी कवि और विचारक जिनकी कविता जौनपुर जिले में पिछले 500 वर्षों से लोकप्रिय बनी हुई है, वे थे ख़्वाजा शम्स-उद्-दीन मुहम्मद हाफ़िज़ शिराज़ी (1325-1389), जो अपनी फ़ारसी ग़जलों के लिए जाने जाते हैं। इनकी फ़ारसी ग़जलों का प्रभाव न केवल जौनपुर अपितु पूरे भारत में देखने को मिला।

हाफ़िज़ का जन्म ईरान के शिराज़ में हुआ था, उनकी मज़ार भी यहीं शिराज़ शहर में स्थित है जहाँ उन्होंने अपना पूरा जीवन बिताया। हालांकि उनका फ़ारसी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान रहा है परंतु उनकी ज़िन्दगी का शुरुआती दौर कठिनाईयों से भरा हुआ था। फ़ारसी जीवन और संस्कृति में उनकी स्थायी लोकप्रियता और प्रभाव की अमिट छाप के बावजूद उनकी ज़िन्दगी के शुरुआती दौर के कुछ विवरण अज्ञात हैं। उन्होंने छोटी उम्र में ही कुरान को याद कर लिया था जिस कारण उन्हें ‘हाफ़िज़’ का खिताब दिया गया। कहा जाता है कि हाफ़िज़ को एक महिला से एकतरफ़ा प्रेम हो गया परंतु उसके ना मिलने पर उन्होंने कविताएँ लिखना शुरु कर दिया और इस्लामी दुनिया के प्रमुख कवि बन गये। उसके बाद उनको कई स्थानीय शासकों से संरक्षण मिला था, जिनमें शाह अबू इशाक, तैमूर और यहां तक कि सख्त शासक शाह मुबारिज़-उद्-दीन मुहम्मद (मुबारिज़ मुज़फ्फर) भी शामिल हैं। उनकी ग़ज़लों का दीवान (कविता संग्रह), ईरान में, हर घर में पाई जाने वाली किताबों में से एक है।

उनकी कविताओं को सूफ़ीवाद के एक स्तंभ के रूप में देखा जाता है, जिनमें रहस्यमयी प्रेम, धर्म और दिखावे वाली ज़िन्दगी का उपहास करना आदि मुख्य रूप से मिलता है। आज तक, हाफ़िज़ के दीवान का उपयोग मार्गदर्शन और दिशा के लिए कई लोगों द्वारा किया जा रहा है। सदियों से, इनकी फ़ारसी कविताओं के अंग्रेजी और हिंदी में अनुवाद करने के कई प्रयास हुए हैं। 1771 में विलियम जोन्स ने उनकी रचना को पहली बार अंग्रेजी में अनुवादित किया था। लगभग सभी भाषाओं में इनकी कविताओं का अनुवादन हो चुका है। उन्होंने ना जाने कितने ही कवियों का मार्गदर्शन किया है।

यहां तक कि शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी की पुस्तक ‘अ मिरर ऑफ ब्यूटी’ (A Mirror of Beauty) में ‘दीवान ऐ हाफ़िज़’ अर्थात हाफ़िज़ के काम के प्रभाव को देखा जा सकता है। इनकी कविताओं से प्रभावित एक कवि द्वारा उनके लिये निम्न उक्ति कही गई है:

“ऐ हाफ़िज़-ए-शिराज़ी
तु काशिफ़ हर राज़ी
तू रा कसम ए शाख ए नाबूद
बे गुह हर चे हस्त राज़
बिस्मिल्लाह अर रहमान अर रहीम”

डैनियल लज़िन्स्की जो कि एक अमेरिकी कवि हैं, उन्होंने 14वीं शताब्दी के फारसी सूफी कवि हाफ़िज़ की कविताओं के आधार पर चार पुस्तकें लिखी हैं: ‘आय हर्ड गॉड लाफिंग’ (I Heard God Laughing), ‘दी सब्जेक्ट टुनाइट इज़ लव’ (The Subject Tonight Is Love), ‘दी गिफ्ट’ (The Gift), तथा ‘अ ईयर विद हाफ़िज़’ (A Year With Hafiz)। उन्होंने अपने प्रस्तुतिकरण के माध्यम से कई लोगों को दीवान ए हाफ़िज़ के साथ परिचित कराया है। उन्होंने हाफ़िज़ की कविताओं में छिपे आध्‍यात्मिक पक्ष उजागर करने का एक सतत प्रयास किया है जो निम्न कविता की कुछ पंक्तियों में दिखता है:

मैंने ईश्वर से बहुत कुछ सीखा है कि
अब मैं खुद को एक ईसाई, हिंदू, मुसलमान,
बौद्ध, या एक यहूदी नहीं बुला सकता।।
सत्य इतना सहभागी बना है मेरा कि
अब मैं खुद को एक आदमी, एक महिला, और फरिश्ता
या यहां तक कि शुद्ध आत्मा भी नहीं बुला सकता।।
प्यार ने इस तरह दोस्ती की है, हाफ़िज़, कि
उसने राख बनकर मुझे मेरे मन की हर विचार और छवि से
रिहा कर दिया है।।

हाफ़िज़ ने अपनी कविताओं के संकलन, दीवान, में अपनी शुरुआती ज़िंदगी का ज़िक्र ख़ुद नहीं किया था। कहा जाता है कि शायद मोहम्मद गोलंदाम नाम के एक व्यक्ति द्वारा उनके दीवान की प्रस्तावना लिखी गयी थी। हाफ़िज़ के दीवान के सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध आधुनिक संस्करणों में से दो को मोहम्मद गज़विनी और कसेम गनी (495 गज़ल) और परविज़ नतेल-खानलारी (486 गज़ल) द्वारा संकलित किया गया है। हाफ़िज़ को अपने जीवनकाल के दौरान इस्लामी दुनिया भर में प्रशंसा मिली। अन्य फ़ारसी कवियों ने उनके काम का अनुकरण किया, और बग़दाद से भारत तक उनके संरक्षण की पेशकश की गई। इस्लामी दुनिया के लोगों के लिये वे शेक्सपियर (Shakespeare) से कम नहीं थे।

संदर्भ:
1.https://www.theatlantic.com/daily-dish/archive/2009/06/poem-for-friday/200014/
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Hafez
3.http://ranasafvi.com/diwan-e-hafiz-aur-faal/
4.http://sebinaol.unior.it/sebina/repository/catalogazione/documenti/Rubaiyat%20of%20Hafiz%20(148688).pdf
5.https://en.wikipedia.org/wiki/Daniel_Ladinsky



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