विभिन्न धर्मों में देवी पूजा का है समान महत्व

जौनपुर

 13-11-2018 02:46 PM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

हम जब भी मंदिरों में दर्शन पूजा के लिए गये हैं तो हमारे द्वारा वहां देखी जाने वाली मुख्य प्रतिमा के साथ विभिन्न मातृ देवियों की प्रतिमाएं भी देखने को मिलती हैं। उन प्रतिमाओं में दुर्गा व काली माता के बारे में तो हम सब जानते हैं, परंतु अन्य मातृकाओं के बारे में बहुत कम लोग जानते होंगे।

हिंदुओं के शाक्त सम्प्रदाय में सप्तमातृका का उल्लेख महाशक्ति की सात देवियों के लिये हुआ है। ये देवियाँ हैं - ब्रह्माणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, इन्द्राणी, कौमारी, वाराही और चामुण्डा अथवा नारसिंही। मातृक पूजन की परंपरा का प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता के एक सिद्धांत से मिलता है। वहीं ऋग्वेद में भी सात माताओं का ज़िक्र है जिनकी देख-रेख में ‘सोम’ की तैयारी होती है। वहीं किसी-किसी सम्प्रदाय में मातृकाओं की संख्या आठ (अष्टमातृका) होती है। नेपाल में अष्टमातृकाओं की पूजा की जाती है जैसा कि नीचे दिए चित्र में आठ मातृकाओं को दर्शाया गया है। कुछ विद्वानों द्वारा इन्हें शैव देवी भी माना जाता है।

1. ब्रह्माणी मातृका को ब्रह्मा की शक्ति माना जाता है। पीले रंग और चार सिर और चार भुजाओं के साथ दर्शायी जाती है। इनके द्वारा कमण्डल, कमल पुष्प, माला तथा पुस्तक को धारण करे हुए दिखाया गया है। यह हंस में सवारी करती हैं। ब्रह्माणी माता कई समाजों द्वारा कुलदेवी के रुप में भी पूजी जाती हैं।

2. वैष्णवी मातृका को भगवान विष्णु की शक्ति माना जाता है। इन्हें माता लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। इनका वाहन गरुड़ है। यह देवी शंख, चक्र, गदा, धनुष और बाण धारण करती हैं।

3. माहेश्वरी मातृका को भगवान शिव की शक्ति माना जाता है। इन्हें नंदी पर बैठे हुए देखा जा सकता है और साथ ही इनके चार या छः हाथ होते हैं।

4. इन्द्राणी मातृका को स्वर्ग के भगवान इंद्र की शक्ति माना जाता है। इन्हें एक चलते हुए हाथी पर सवार हुए चित्रित किया गया है, साथ ही ये अश्वेत रंग की, इंद्र की तरह दो या तीन आंखो वाली दर्शाई जाती हैं। वह वज्र और कमल के डंठल से सशस्त्र हैं।

5. कौमारी मातृका को युद्ध के देवता कुमार की शक्ति माना जाता है। इनका वाहन मोर है और इनके चार या बारह हाथ है। उन्हें भाला, कुल्हाड़ी, शक्ति या चांदी के सिक्कों और धनुष के साथ दर्शाया गया है।

6. वाराही मातृका को विष्णु या यम, मृत्यु के देवता की शक्ति माना जाता है। इनके हाथ में एक डंडा, वज्र या तलवार, और एक पानपात्र दर्शाया गया है।

7. चामुण्डा मातृका को देवी चंडी की शक्ति माना जाता है। उन्हें अश्वेत रंग की मुंडमाला धारण करे हुए और डमरू, त्रिशूल, तलवार और पानपात्र को धारण करे हुए रूप में वर्णित किया गया है।

8. नारसिंहीं को नरसिम्हा की शक्ति माना जाता है। ये शेर की देवी मानी जाती हैं और वे अपने शेर को हिलाकर तारों को गिरा सकती हैं।

देवियों की पूजा की प्रथा हिन्‍दू धर्म में ही नहीं वरन् मुस्लिम और ईसाई धर्म में भी देखने को मिलता है। तथा सभी धर्मों में माताओं को समान उद्देश्‍य (क्षमा, करूणा, नम्रता, प्रवीणता, प्रेम) के लिए पूजा जाता है। यदि इस्‍लाम में देवी पूजा की बात की जाए तो थोड़ा आश्‍चर्य सा होता है। कुरान में बताया गया है कि ईश्वर या तो स्‍त्री हैं या पुरूष, इनकी विशेषताओं दया, करूणा, सहिष्‍णुता क्षमा के आधार पर ये स्‍त्री के ज़्यादा निकट प्रतीत होते हैं। यह बात तो इस्‍लाम भी स्‍वीकार करता है कि स्त्रियों के अस्तित्‍व को स्‍वीकारे बिना संसार को एकिकृत स्‍वरूप नहीं दिया जा सकता।

कुरान में अल्लाह ने स्‍वयं को कठोरता और दया के रूप में प्रकट किया है, जिन्‍हें महिमा (जलाल) और सौंदर्य (जमाल) के नाम से जाना जाता है, जिसमें पौरूष और स्त्रीत्व दोनों के गुण समाहित हैं। साथ ही कुरान में मसीह की माता मैरी के प्रति भी सम्‍मान अभिव्‍यक्‍त किया गया है। इस्‍लाम धर्म के प्रवर्तक स्‍वयं मैरी को अन्‍य स्‍त्र‍ि‍यों की तुलना में श्रेष्‍ठ मानते हैं। तथा ये कहते हैं कि स्‍वर्ग माता के चरणों में है। इस्‍लाम धर्म के पवित्र स्‍थल मक्‍का में बना मेहराब स्‍त्री (यीशु की माता मैरी) का प्रतीक है, जो इस भौतिक संसार में एक दिव्‍यात्‍मा को जन्‍म देता है। कुरान में पैगंबर ज़कारिया मैरी की भक्ति से ईश्वर का आह्वान करना सीखते हैं।

ऐसा माना जाता है कि फ़ातिमा, इस्लामी पैगंबर मुहम्मद और खादिजा की इकलौती संतान थी। ईरान की इस्लामी परंपरा में फ़ातिमा की जयंती (20 जुमादा अल-थानी) को मातृ दिवस के रूप मनाया जाता है, जिसकी तिथी हर वर्ष बदलती रहती है। इस दिन सरकारी भवनों, निजी इमारतों, सार्वजनिक सड़कों और गाड़ी की खिड़कियों पर ‘या फ़ातिमा’ लिखकर बैनर (Banner) लगाए जाते हैं। मुसलमानों द्वारा फ़ातिमा को उनकी नैतिक और शारीरिक विशेषताओं की प्रशंसा करने के लिए कई खिताब दिए गये हैं। सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला शीर्षक ‘अल-ज़हरा’ है, जिसका अर्थ है ‘चमकदार’, और उसे आमतौर पर फ़ातिमा ज़हरा के रूप में जाना जाता है। उन्हें ‘अल-बतुल’ (पवित्र और शुद्ध) के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि उन्होंने अपना अधिकांश जीवन प्रार्थना में बिताया।

संदर्भ:
1.https://en.wikipedia.org/wiki/Matrikas
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Yogini
3.https://www.sol.com.au/kor/22_02.htm
4.https://sufism.org/library/articles/feminine-symbols-in-islam
5.http://www.adishakti.org/text_files/islam_and_the_divine_feminine.htm



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