क्यों और किसने कहा जौनपुर को पहली बार शिराज़-ए-हिंद?

जौनपुर

 17-10-2018 01:46 PM
मध्यकाल 1450 ईस्वी से 1780 ईस्वी तक

जौनपुर का इतिहास बहुत ही स्वर्णिम रहा है, इसको शिराज-ए-हिंद के खिताब से भी नवाजा गया था। आइए जानते हैं आखिर क्यों कहा जाता है जौनपुर को शिराज-ए-हिंद।

शरकी शासनकाल के दौरान जौनपुर श‍रकियों की राजधानी बन गयी थी। उन्होंने किले के भीतर और शहर चारों ओर सैकड़ों मस्जिदों और मदरसों का निर्माण किया। और इनमें दुनिया के विभिन्न हिस्सों से विद्वान पुरुषों और भक्तों को बुलाया गया। साथ ही शहर के राजा और राज्यपाल द्वारा शिक्षकों को उपनिवेश और पदकों से नवाजा गया, ताकि शिक्षक निश्‍चिंत रूप से छात्रों का पठन पाठन करा सकेे।

मुहम्मद शाह के समय में जौनपुर के गवर्नरों को विद्वानों और भक्तों का सम्मान करने के लिए हमेशा आदेश जारी किए जाते थे। साथ ही स्थानीय राजकोश के मुखिया को मदरसों की रक्षा करने के लिए नियुक्त किया गया था। राजाओं द्वारा लेखकों को मदरसों की स्थिती और शिक्षकों के वेतन की जांच करने और उसमें एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए बुलाया जाता था। वहीं राजाओं को खुश रखने के लिए मदरसों और मठ में आने वाले राजकुमारों और रईसों का बड़े उपहार देकर सम्मान किया जाता था।

मुहम्मद शाह के बाद अवध प्रांत, बनारस और जौनपुर सरकार को नवाब बुरहान-उल-मुल्क सादत खान की देखभाल के लिए सौंप दिया गया था। जब नवाब जौनपुर आए तो सभी उनके दरबार में पहुंचे, चुंकि धार्मिक विद्वान और शिक्षकों का राज दरबार में उपस्थित होना अनिवार्य नहीं था, इसलिए उनमें से कोई भी दरबार नहीं गया। संयोग से एक दिन नवाब खुद ही उस समय के सम्मानित प्रसिद्ध पुरूषों के नेता से मिलने चले गए।

एक दिन राजा हुमायूं और शाह ताहमास (फारस के सम्राट) की पहली मुलाकात मे जब शाह ताहमास ने हुमायूं से जौनपुर की जनसंख्या और प्रसिद्ध पुरुषों का मूल्यांकन करने को कहा, तब हुमायूं ने जौनपुर के राज्य के अधिकारियों को मदरसों की खोज करने को कहा और वहाँ के शिक्षित व्यक्तियों का सम्मान करने का आदेश दिया। और इसफान में भी मदरसे और मठ बनवाए, साथ ही शिक्षित और विद्वान लोगों को बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए बुलाया गया। इसके कई सालों बाद, शाहजहां द्वारा जब जौनपुर और ईरान के इस संबंध के बारे में पता चलता है तो वे जौनपुर के लिए "भारत के शिराज" का वर्णन करते हैं। यह "तारीख-ए-शाहजहानी" में भी दर्ज किया गया, और उन्होंने जौनपुर को ‘दार-उल-लम’ का नाम भी दिया था।

संदर्भ :-
1.https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.334064/page/n21


RECENT POST

  • खरोष्ठी लिपि का इतिहास
    ध्वनि 2- भाषायें

     14-10-2019 02:43 PM


  • महर्षि वाल्मीकि से जुड़े रोचक तथ्य
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     13-10-2019 10:00 AM


  • भारत के सबसे लोकप्रिय और मनभावक रेल मार्ग
    य़ातायात और व्यायाम व व्यायामशाला

     12-10-2019 10:00 AM


  • औषधीय और स्वादिष्ट गुणों से भरपूर कागज़ी नींबू
    पेड़, झाड़ियाँ, बेल व लतायें

     11-10-2019 10:41 AM


  • क्या है विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस?
    विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

     10-10-2019 12:35 PM


  • क्या पृथ्वी से बनाई जा सकती हैं अंतरिक्ष तक जाने वाली लिफ्ट (Elevator)?
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     09-10-2019 02:16 PM


  • विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न तरीके से मनाया जाता है दशहरा
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     08-10-2019 10:00 AM


  • वायु गुणवत्ता बताने में सहायक है वायु गुणवत्ता सूचकांक
    जलवायु व ऋतु

     07-10-2019 10:48 AM


  • चार सौ साल पुरानी प्रथा है, नवरात्री के अंतिम दिन का सिन्दूर खेला
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     06-10-2019 10:15 AM


  • तकनीक में विकास के चलते बढ़ सकती है आलू की पैदावार
    साग-सब्जियाँ

     05-10-2019 10:12 AM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.