भारत की प्राचीन जजमानी प्रथा

जौनपुर

 09-10-2018 03:52 PM
सिद्धान्त 2 व्यक्ति की पहचान

औपनिवेशिक युग में जाति व्यवस्था ने काफी गहराई तक जड़ें जमाई हुई थीं। उस वक़्त प्रत्येक जाति के सदस्यों को पैदा होते ही उपहार स्वरुप मिली परंपराओ और कार्य का पालन करना होता था, हालांकि विभिन्न जातियों को सामाजिक रूप से अलग किया गया, फिर भी उस समय कई जातियां एक दूसरे पर निर्भर रहती थी। इस तरह की परस्पर निर्भरता को “जजमानी प्रणाली” का नाम दिया गया था।

इस प्रणाली के तहत भूमिगत उच्च जातियों और भूमिहीन सेवा जातियों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान होता था। सेवा जातियों में परंपरागत रूप से बुनकर, चमड़े के श्रमिक, लोहार, सुनार, नाई, धोबी, और समुदाय की सेवा करने वाले कारीगरों के समूह शामिल होते थे। भूमिगत उच्च जाति वाले जजमान संरक्षक होते थे, और सेवा जाति वाले ‘कामिन’ कहलाते थे। यह प्रणाली वंशानुगत थी, इसलिए इसमें जजमानी और कामिन अधिकार मृतक जजमान और कामिन के उत्तराधिकारी के बीच में समान रूप से वितरित किये जाते थे। यानी भूमिहीन सेवा जातियों से संबंधित परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी भूमिगत उच्च जातियों के परिवारों को अपनी विशेष सेवाएं प्रदान करते रहेंगे। इसमें यदि किसी व्यक्ति की केवल बेटी होती थी, तो उसका दामाद इसे आगे बढ़ाता था। अगर कोई नि:संतान है तो उसके किसी निकटम रिशतेदार को इसे आगे बढ़ाना पड़ता था।

जजमानी प्रणाली की शब्दावली विलियम विसार द्वारा भारतीय सामाजिक मानव विज्ञान में पेश की गई थी। जिसमें उन्होंने अपने उत्तर प्रदेश के एक गांव के अध्ययन में, यह पाया कि विभिन्न जातियों द्वारा वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन का आदान-प्रदान होता था। वहीं रूपांतर के साथ, यह प्रणाली पूरे भारत में मौजूद थी।

जजमानी प्रणाली के कुछ फायदे भी थे:

1) व्यवसाय की सुरक्षा: जजमानी प्रणाली में व्यवसाय की सुरक्षा रहती थी। चूंकि यह प्रणाली वंशानुगत थी, इसलिए कामिन को अपने व्यवसाय का आश्वासन रहता था। इसमें बंधा हुआ हर व्यक्ति यह जानता था कि यदि वह अपने परिवार के व्यवसाय को तोड़ देता है तो वह अपनी आजीविका कमाने में अक्षम हो जाएगा।

2) आर्थिक सुरक्षा: यह कामिन को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती थी, क्योंकि जजमान उसकी सारी जरूरतों को पूरा करता था। हर आर्थिक संकट में जजमान कामिन की मदद करता था।

3) घनिष्ठ संबंध: इसमें जजमान और कामिन के बीच घनिष्ठ संबंध रहता है। यह रिश्ता पूरी तरह से आर्थिक ही नहीं लेकिन यह भावनात्मक भी होता है। जजमान और कामिन दोनों एक-दूसरे की सीमाओं का अच्छी तरह से पालन करते थे। अलग-अलग जाति का होने के बावजूद भी वे एक दूसरे के साथ तालमेल बनाने की कोशिश करते थे।

4) शांतिपूर्ण जीवन: इसमें कोई भी जजमान बिना सेवा के और कोई भी कामिन बिना भोजन के नहीं रहता था, जिस वजह से यह प्रणाली सहानुभूति और सहयोग की भावना पैदा करके शांतिपूर्ण जीवन का माहौल बनाती थी।

जिस चीज के इतने फायदे हों, उसके कुछ नुकसान भी होना ज़ाहिर सी बात है।

1) शोषण का स्रोत: यह प्रणाली शोषणकारी होती थी। इसमें भूमिहीन सेवा जातियों का शोषण पितृत्व संबंधों की वजह से किया जाता था। ऑस्कर लुईस ने रामपुर गांव में जजमानी प्रणाली के अपने अध्ययन में बताया कि पहले ये व्यक्तिगत संबंधों पर आधारित होता था, लेकिन अब यह जाजमानों द्वारा शोषण का साधन बन गया।

2) उच्चता और असमानता का अनुभव: इस प्रणाली में कामिन को कम माना जाता था, जबकि जजमानों को उच्च दर्जा दिया जाता था। चूंकि यह प्रणाली अनुवांशिकता पर आधारित थी, इसलिए कामिन अन्य नौकरी और व्यवसाय में या अपनी आर्थिक स्थिति में भी कोई बदलाव नहीं कर सकते थे। इसने लोगों की मानसिकता पर प्रभाव डाला और जजमानों द्वारा भी उनका शोषण और दुर्व्यवहार किया जाने लगा।

3) जाति व्यवस्था द्वारा समर्थित: जाति व्यवस्था जजमानी प्रणाली का आधार थी, जो जाति प्रथा की सभी बुराइयों से ग्रस्त थी।

परिवहन और संचार के तेजी से विस्तार के कारण, इस प्रणाली में काफी गिरावट आ गयी। कामिन गांव से बाहर जाकर अन्य व्यवसाय की तलाश करने में सक्षम हो गए और साथ में सामाजिक सुधार आंदोलनों के प्रभाव के कारण शोषित जातियों को काफी लाभ मिलने लगा। आर्य समाज जैसे विभिन्न धार्मिक सुधार आंदोलनों ने जजमानी प्रणाली को बंद करने में काफी योगदान दिया। आज अधिकांश गांव समुदाय जजमानी-कामिन प्रणाली के अधीन नहीं है।

संदर्भ:
1.http://www.yourarticlelibrary.com/caste/jajmani-system-in-indian-caste-system-definition-function-and-other-details/34945
2.http://www.sociologydiscussion.com/jajmani-system/features/9-main-features-of-jajmani-system-in-india/2674
3.http://www.sociologydiscussion.com/jajmani-system/jajmani-system-in-india-meaning-definition-advantages-and-disadvantages/2652
4.https://en.wikipedia.org/wiki/Jajmani_system



RECENT POST

  • औषधीय गुणों के साथ रेशम उत्पादन में भी सहायक है, शहतूत की खेती
    पेड़, झाड़ियाँ, बेल व लतायें

     30-10-2020 04:16 PM


  • भारत में लौह-कार्य की उत्पत्ति
    मध्यकाल 1450 ईस्वी से 1780 ईस्वी तक

     29-10-2020 05:43 PM


  • पंजा शरीफ में भी मौजूद है पैगंबर मुहम्मद साहब कदम
    वास्तुकला 1 वाह्य भवन

     29-10-2020 09:50 AM


  • मोहम्‍मद के जन्‍मोत्‍सव मिलाद से जूड़े अध्‍याय
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     27-10-2020 09:59 PM


  • कोरोना महामारी के प्रसार को रोकने में चुनौती साबित हो रहा है जल संकट
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     27-10-2020 12:32 AM


  • दशानन की खूबियां
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     26-10-2020 10:38 AM


  • आश्चर्य से भरपूर है, बस्तर की असामान्य चटनी छपराह
    स्वाद- खाद्य का इतिहास

     25-10-2020 05:59 AM


  • नृत्‍य में मुद्राओं की भूमिका
    द्रिश्य 2- अभिनय कला

     23-10-2020 08:17 PM


  • दिव्य गुणों और अनेकों विद्याओं के धनी हैं, महर्षि नारद
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     22-10-2020 04:58 PM


  • जौनपुर के मुख्य आस्था केंद्रों में से एक है, मां शीतला चौकिया धाम
    वास्तुकला 1 वाह्य भवन

     21-10-2020 09:38 AM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.

    login_user_id