Machine Translator

सूतक और त्रयोदशः

जौनपुर

 19-03-2018 11:33 AM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

सनातन धर्म में जीवन का हर पड़ाव 16 संस्कारों में बंटा हुआ है और प्रत्येक संस्कार का अपना एक अलग महत्व होता है चाहे वह गर्भधारण संस्कार हो या अन्त्येष्टि संस्कार। बच्चा जब पैदा होता है तभी से वह कई संस्कारों से होकर गुजरता है और एक समय आता है जब वही बच्चा बुजुर्ग होकर परलोक सिधार जाता है। अब उसका अंतिम संस्कार किया जाता है जिसे अन्त्येष्टि संस्कार कहा जाता है जिसका सम्बन्ध यही है कि मानव 5 तत्वों से मिल कर बना है और अन्तोगत्वा वह उन्हीं 5 तत्वों में मिल गया। जिस घर में भी किसी की मृत्यु होती है उसके यहाँ 16 दिन तक कई विभिन्न कर्मकांड किये जाते हैं जिनमें प्रमुख है गरुण पुराण की कथा कहा जाना, सूतक या शुद्धक (शुद्ध), तेरही या त्रयोदशः और अंत में सोरही। इन तमाम कर्मकांडों का अपना एक अलग महत्व होता है।

मृत्यु के बाद अंत्येष्ठी से आने के बाद पीपल या अन्य किसी एक पेड़ में दो मटके बांधे जाते हैं जिनमें प्रतिदिन सुबह और शाम को पानी दिया जाता है तथा दीपक जलाया जाता है। इस कर्मकांड को सनातनी में बहुत महत्वपूर्ण माना गया है, सनातनी परंपरा के अनुसार मृतक की आत्मा अभी तक स्वर्ग नहीं गयी है तथा वो सब के बीच में ही स्थित है इसलिए आत्मा को पानी व दीप दिखाया जाता है। 11 वें या 12 वें दिन परिपाटी होती है जिसमें सभी ग्रामवासी व सगे सम्बन्धी अपने सर का मुंडन कराते हैं। उसी दिन आत्मा को एक गाय के जरिये वैतारना नदी पार करवाया जाता है। तथा उस बंधे मटके को फोड़ा जाता है। इस कर्मकांड को शुद्धक इस लिए भी कहा जाता है क्यूंकि इस दिन पूरे घर की सफाई की जाती है तथा पूरे घर को शुद्ध किया जाता है।

अन्त्येष्टि के 13वें दिन मरणोत्तर संस्कार किया जाता है। यह शोक-मोह की पूर्णाहुति का विधिवत् आयोजन है। मृत्यु के कारण घर में शोक- वियोग का वातावरण रहता है, बाहर के लोग भी संवेदना- सहानुभूति प्रकट करने आते हैं- यह क्रम तेरह दिन में पूरा हो जाना चाहिए, ताकि भावुकतावश शोक का वातावरण लम्बी अवधि तक न खिंचता जाए। इस दिन विभिन्न ब्राह्मणों व लोगों को बुला कर विभिन्न पकवानों को खिलाया जाता है जिसका सीधा तात्पर्य यह है कि परिवार में व्याप्त दुःख कम हो सके और कई दिनों से जो शोक में खाना आदि न खाए हों 13वें दिन अच्छे से खा लें ताकि उनकी तबियत सही रहे। अब 16 वें दिन जाकर पूरा कर्मकांड पूर्ण होता है।

1. अवध संस्कृति विश्वकोष-1, सूर्यप्रसाद दीक्षित



RECENT POST

  • विलियम होजेज़ के चित्र में 1792 का दूर्लभ जौनपुर
    उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

     16-11-2018 05:23 PM


  • जब जौनपुर को बुलाया जाता था जौनपुर सरकार
    मध्यकाल 1450 ईस्वी से 1780 ईस्वी तक

     15-11-2018 04:36 PM


  • भारत और कोरिया का सम्बन्ध है 1800 साल से भी पुराना
    छोटे राज्य 300 ईस्वी से 1000 ईस्वी तक

     14-11-2018 01:26 PM


  • विभिन्न धर्मों में देवी पूजा का है समान महत्व
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     13-11-2018 02:46 PM


  • औपनिवेशिक काल के दौरान भारतीय सेना को दिए गए पदक
    उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

     12-11-2018 04:00 PM


  • वेदों में मौजूद हैं विज्ञान के कई सिद्धांत
    विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

     11-11-2018 10:30 AM


  • कहाँ से आया ये अजीब सा शब्द डेंगू?
    तितलियाँ व कीड़े

     10-11-2018 10:00 AM


  • क्या आप जानते हैं आम से जुड़ी ये पौराणिक कहानी
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     09-11-2018 10:00 AM


  • जानियें नवरात्री के पहले दिन जौ उगाने की मान्यता क्यों है
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     08-11-2018 10:00 AM


  • दीपावली के अवसर पर याद करते हैं नीरज जी की कविता, दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
    विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

     07-11-2018 12:06 PM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.